श्री महार्षि प्रवचन

 ऐ जीव ऐसा प्रतीत होता  कि तू डरता है शायद तू मुझे अपने साथ नहीं देखता । केवल यही कारण तेरे भय का है । मैं तुझे विशवास दिलातां हूं कि मैं तेरे साथ हूं । तू यह जान  और  भय से मुक्त हो जा ।  तू घबराता है, शायद इस लिऐ कि तुझे पता नहीं कि तेरे जीवन का रक्षक तेरे साथ  है । जिसने तुझको सूर्य, चन्द्र्मा, जल, वायु तेरे बिना मांगे तेरी रक्षा के लिए दिये हैं, वह रोटी भी देता रहेगा । उसके पास सब कुछ है और हमेशा रहेगा । तू सन्देह मत कर । तू उसके भरे खजानों को देख कर अपने लिये न मिलने  का सन्देह मत कर । मैं तुझको विशवास दिलाता हं कि मैं तेरा परम हितैषी हूं, तेरा सच्चा मित्र हूं और तेरे दुःख का साथी हूं । क्या मेरा प्रेम तुझे मुझसे प्रेम करने को मजबूर नहीं करता ? क्या मेरी दया तेरे दिल में मेरे लिये वफादारी पैदा नहीं करती ? तू मेरे प्रेम को देख कर मुझसे प्रेम कर और मेरी दया को देख कर मेरा बन जा । ऐसे न चल कि मुझे तुझको जबरदस्ती वापस लाना पडे । तुझे उसमें कष्ट होगा और मैं भी इस दुःख से पीडित हूंगा । तू देख कि मैं कितना सुन्दर हूं । सब कुछ मेरे पास है, इसलिये तू मुझी को प्रेम करना सीख । मैं अन्नत काल तक तेरे साथ रहूंगा और तुझको हर एक खुशी देता रहूंगा । मैं हर सौन्दर्य का और हर आनन्द का आनन्द हूं । मुझसे भिन्न पदार्थ पहिले मेरा बनने पर तुझको खुशी दे सकेंगे वर्ना नहीं । तू संसार के लिये मुझको मत छोङ । वह पहले ही तेरे लिये बनाया गया है । वह समयानुसार तुझको मिलता रहेगा । तू मेरी याद कर । मैं तुझको सब कुछ दे दूगां । मैंने संसार और तुझको एक जरा से इशारे (छोटे से संकल्प) से पैदा कर दिया । मुझें इसमे कोई कष्ट न हुआ । अब क्या तुझको जीवन रक्षा के समान देते हुए मुझे कष्ट होगा ? जब मैं तेरी इच्छा के विरुद चलता हूं, तू मुझ पर नाराज होता है और क्या तू कभी अपने मन से भी लडा जो नित्य मेरी इच्छा के विरुद चलता है । संसार तुझको अपना स्वार्थ लेकर प्रेम करेगा और मैं तुझको तेरे ही स्वार्थ की पूर्ति के लिये बुलाता हूं । मेरा मन तुझे कुछ देने को चाहता है । तू मेरे सामने खाली हो कर आ ताकि तुझे भर दिया जाये । तू सब बातों का ध्यान छोड कर केवल मेरा ध्यान कर और यह तेरा धर्म है । जो कुछ मुझे तेरे लिये करना है वो मैं कर रहा हूं और करता रहूंगा  जो कि मैंने तेरे लिए बना रखा है । लेकिन अगर तू किसी असमर्थता के कारण उस अपने धर्म को पूरा न करेगा जो मेरे लिये है तो मैं तो अपने उस कर्त्तव्य को पूरा करता ही रहूंगा जो कि मैंने तेरे लिये बना रखा है । मैंने उस समय भी तेरी चिन्ता की जब तू अपनी चिन्ता के योग्य न था, बहुत छोटा था । मेरे लिये अब भी तू वैसा ही है । विशवास कर, मैं तेरी चिन्ताऔं को दूर करता ही रहुंगा । जिस प्रकार मैं तुझसे कल का पूजन, कल का सिमरन, ध्यान और याद आज नहीं मांगता, उसी प्रकार तू भी मुझसे कल की आवशयकताऔं की पूर्ति आज मत चाह । मेरी इच्छा है तूझको नित्य का सामान दे दूं या आज का आज, कल का कल । जब मैं कुछ नहीं देता, उसमें भी कुछ दिया ही करता हूं । मेरे लिये कांटे पुष्प से अधिक सौन्दर्य रखते हैं । जो देता हूं, चुपके से लिये जा । मैं तुझसे अधिक तेरी भलाई को जानता हूं और तुझको बडा बनाना चाहता हूं ।  मैंने जो कुछ तुझको दिया है, तू उसमें सन्तुष्ट हो जा, इसका विरोध न कर, तुझे कष्ट होगा और तू अपनी शक्ति से उसको बदल न सकेगा । इस प्रकार धन्यवाद में भी कमी होगी । तू मेरी इच्छा से सन्तुष्ट रह । तेरे तन और मन को शांति मिलेगी और तेरी दौलत बढेगी । तू जब मेरा ध्यान करे, मेरी महानता को अच्छी प्रकार समझ । उसको यहां तक देख कि अपने को या तो तुच्छ बना ले या बिल्कुल न होने के ब्रराबर समझ । मेरे महान प्रकाश, तेज और बल का ध्यान कर और मुझको अपने साथ समझ कर भय से मुक्त हो जा । तू मेरे सामने बैठकर छोटा न रहेगा । मेरी दया तुझको मेरे साथ मिलाती रहेगी । मैं तुझको विशवास दिलाता हूं अगर तू अपनी इच्छा से मेरी इच्छा को बडा मान ले और मेरी आज्ञाओं को जब्र करके भी मनवाये तो तेरा हॄदय पवित्र हो जायेगा, तुझको बेपरवाही मिल जायेगी । तेरे मन से इच्छाऐं और उनकी पूर्ति का कष्ट जाता रहेगा । मैं इस संसार को आज्ञा दे दूंगा कि वह हर बात का ध्यान रखे, तेरी हर मुशकिल में काम आये और अगर तुझ पर कोई ऐसी कठिनाई आ जाये कि जिसको संसार भी दूर न कर सके तो मैं सर्वशक्तिमान महान तेज वाला स्वंय आकर तेरे उस कष्ट को दूर कर दूंगा । यह सच है और बिल्कुल सच है । इस प्रकार हर चिन्ता से मुक्त हो जायेगा । हर आराम तुझको मिल जायेगा, संसार मेरा है, मैं तुझको दे दूंगा और तेरे हर लोक और परलोक की जरुरतों को मैं पूरी करता रहूगा । चिन्ता मत कर ।

          ॐ शान्ति शान्ति शान्ति । ।

 

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुवरेण्यं भर्गो
देवस्य धीमहि धियो
यो नः प्रचोदयात ॥

उस प्राणस्वरूप,
दुःखनाशक, सुखस्वरूप,
श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक् देवस्वरूप
परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण
करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को
सन्मार्ग में प्रेरित करे ।

 

‘सेवा धर्म परम गहनो’

“भलाई वह बीज है, जो उगे बिना रहता नहीं । उस पर अच्छे और मीठे फल आते ही हैं, भले ही इसमें कुछ देर लगे ।”
श्री राम शर्मा आचार्य
सेवा-धर्म की महिमा अपरंपार है । जीवन में इससे बढकर अन्य कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है । कोई भी मनुष्य चाहे कितना भी धन-दौलत वाला क्यों न हो, चाहे कितने भी बढे पद पर आसीन क्यों न हो, चाहे कितने भी बडे ठाठ-बाट से क्यों न रहता हो, वह कभी भी समाज में दूसरों की श्रद्धा और प्रंशसा का पात्र नहीं बन सकता यदि उसके अंदर समाज-सेवा व परोपकार की भावना न हो ।
अपने लिये तो हर कोई जीता है । इसमें क्या बडी बात है । आज की इस स्वार्थ-परायण दुनिया में ऐसे कितने ही लोग हैं जो कई प्रकार के भले-बुरे काम करके लाखों-करोडों रुपया इक्ठ्ठा कर अपने व अपने परिवार के साथ सुख और ऐशर्वय के साथ आलीशान जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं जिन्हें न कोई जानता है और न ही कोई पहचानता है ।
परन्तु कुछेक लोग ऐसे भी हैं जिनके लिये धन से भी अधिक महत्वपूर्ण यदि कुछ है तो वह है दूसरों की सेवा करना । किसी जरुरतमंद और दीन-दुखी के काम आना वे अपना प्रथम कर्त्त्व्य समझते हैं । एक सच्चे सेवक की तरह अपने आपको जी-जान से मानवता के प्रति समर्पित करते हुए लोकोपकार तथा जनहित कार्यों में सलंघन हो अपने आपको तो वे धन्य करते ही हैं, इसके साथ ही वे दूसरों के लिये भी एक आदर्श प्रस्तूत करते हैं जो अनुकरणीय भी है और प्रशसंनीय भी । ऐसे ही एक सज्जन पुरूष हैं – श्री केदार नाथ गुलाटी – सह-संस्थापक बाल-सदन, सैक्टर १२-ऐ, पचंकूला, जिन्होंने अपने अनथक प्रयास से यह कर दिखाया है कि यदि कोई व्यक्ति लगनपूर्वक किसी सेवा-कार्य में जूट जाये तो वह क्या नहीं कर सकता ।
सादगी, मिलनसारिता और नम्रता के प्रतीक श्री गुलाटी एक सच्चे सेवक और कर्मठ कर्मयोगी हैं । जरूरत-मन्दों की सहायता करना और दीन-दुखियों की सेवा करना उनका स्वाभाविक गुण है । परमार्थ और परोपकार को वे अपना सर्वोच्च धर्म मानते हैं । प्रेम, सहानुभूति, दया, करूणा उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है । दूसरों का दुःख-दर्द उनसे देखा नहीं जाता ।
ऐसे ही एक दिन सन १९९२ में जब वे अपने मित्र स्वर्गीय श्री सतीश अलमाडी और एक अन्य मित्र के साथ माता मनसा देवी मंदिर को गये तो उन्होंने वहां तीन छोटे-छोटे बच्चों को कडाके की सर्दी में भिक्षा मांगते पाया । इतनी छोटी उम्र में और वो भी इतनी कडाके की सर्दी में उन बच्चों को भिक्षा मांगते देख उन्हें बडा दुख हुआ । उन्होंने उन बच्चों से इसका कारण पूछा । जब उन बच्चों ने उनको बताया कि उनका पिता किसी जुर्म में जेल में है और उनकी मां भी इस दुनिया में नहीं, तो उनका कोमल हृदय पसीज उठा । एक सच्चे इंसान के नाते उन्होंने उन बच्चों की मदद करनी चाही । उन्होंने और उनके मित्रों ने सर्वप्रथम उन बच्चों के पुनर्वास के बारे में कुछ करने का विचार किया क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं वे बच्चे किन्हीं गलत लोगों के हाथ न लग जायें और उनकी जिंदगी बरबाद हो जाये ।
उन्होंने इस बारे में एक – दो संस्थाओं से इस बारे में बातचीत भी की किंतु उन्होंने अपने वहां स्थान की कमी के कारण उन बच्चों को लेने से इंकार कर दिया । तदुपरांत उन्होंने स्वंय ही उन बच्चों के लिये कुछ करने की ठानी । उन्होंने हरिपुर में एक कमरा किराये पर लिया और उन बच्चों के वहां ठहरने की व्यवस्था करा दी और साथ ही साथ उन बच्चों को किसी स्थानीय स्कूल में दाखिल करा दिया । उनके विचार में उन बच्चों को शिक्षा दिलाना बहुत आवशयक था क्योंकि बिना शिक्षा के उनका भविष्य अंधकारमय था । उनका कहना है,” शिक्षा के द्वारा ही बच्चों का जीवन ढलता है और शिक्षित होकर ही वे समाज के लिये उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं ।” एक महिला जिसका पति किसी अपराध के कारण जेल में था, उनकी आया रख दी । वह स्वंय अपने तीन बच्चों को साथ लेकर वहां रहने को आ गई । उन सबके रहन-सहन का सारा खर्च श्री गुलाटी व उनके स्वर्गवासी मित्र श्री अलमाडी ने मिलजुल कर किया ।
धीरे-धीरे कुछ अन्य गरीब बच्चे भी वंहा सहायता के लिये आ गये । उन्होंने उनकी भी खुले दिल से सहायता की और शिक्षा की व्यवस्था की क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि कोई भी बच्चा सिर्फ इसलिये ठुकराया जाये और शिक्षा से वंचित किया जाये क्योंकि वह निर्धन है । वे यह अच्छी तरह जानते थे कि शिक्षा के द्वारा ही इन बच्चों की जिंदगी संवारी जा सकती है और शिक्षा द्वारा ही कोई व्यक्ति समाज व मानवता की सच्ची सेवा कर सकता है । वे यथासंभव उन बच्चों की सहायता अपनी ओर से करते रहे ।
जब धीरे-धीरे बच्चों की संख्या और बढने लगी, तो उन्हे वह किराये का कमरा कम जान पढा । उनका ध्यान उन बच्चों के लिये एक निजी भवन बनाने की तरफ गया । उनके अनुसार, जब तक उन बच्चों के रहने के लिये स्थाई तौर पर रहने की कोई व्यवस्था नहीं हो जाती, उनके लिये कुछ करना नमुमकिन था । इसके लिये ज्यादा पैसों की जरूरत थी । फिलहाल उसी साल १९९२ में ही उन्होंने अपने अन्य मित्रों के साथ मिलकर अपनी संस्था ‘बाल सदन’ को सोसाईटी एक्ट १८६० के अंतर्गत रजिस्टर करा एक छोटा सा घर खरीद लिया । परतुं यह स्थाई व्यवस्था नहीं थी । अपनी संस्था के निजी भवन के लिये वे धन की व्यवस्था कराने अतः अन्य कार्य के लिये वे दिन-रात भ्रमण करते रहे । जब कोई प्रयत्न सच्चे मन से किया जाता है, तो वह एक दिन सफल अवश्य होता है । अपने अथक प्रयास से उन्होंने अपनी संस्था के लिये १९९३ में हरियाणा शहरी विकास अथोरिटी से ८४६ स्क्वेयर मीटर का एक प्लाट सैक्टर १२-ऐ में खरीद लिया और उसका निर्माण आरंभ करा दिया । दुर्भाग्यवश १९९५ में उनके मित्र श्री अलमाडी का निधन हो गया और संस्था एवं बच्चों की देखभाल का सारा भार उन पर आ पडा । पर उन्होंने हिम्मत न हारी । अपने अन्य मित्रों व सहयोगीयों के साथ मिलकर वे संस्था के निजी भवन के निर्माण कार्य में लगे रहे । कुछ ही समय में भवन की इमारत तैयार हो गई और सन २००० में बच्चे स्थाई तौर पर वंहा पर स्थानातंरित हो गये । यह उनके और उनके सहयोगी मित्रों के लिये एक बहुत बढी उपलब्धि थी । धीरे-धीरे सरकार से अतः अन्य दानी व्यक्त्तियों से यथायोग्य सहायता भी मिलनी प्रांरभ हो गई जिससे संस्था का काम चलाना अधिक आसान हो गया ।
जैसे-जैसे संस्था से इसी विचारधारा के अन्य व्यक्ति जुडते गये जो इस परोपकार में अपना योगदान देना चाहते थे, वैसे-ही-वैसे संस्था की गतिविधियां भी बढती गईं । उनमें सबसे महत्वपूर्ण था बच्चों को शहर के अच्छे स्कूलों में दाखिल कराना और उनको व्यवसायिक शिक्षा देने का प्रबंध कराना । संस्था की बढती गतिविधियों को देखते हुये उन्होंने एक बोर्ड गठित किया ताकि संस्था का सारा काम सुचारू रूप से चलता रहे । इस समय संस्था के गठित बोर्ड के सदस्यों की संख्या ११ है जो संस्था की सारी व्यवस्था करते हैं । इसके सभी सदस्य भिन्न-भिन्न व्यवसायों से जुडे समाज के जाने-माने एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं ।
इस समय संस्था में ६-१२ साल की उम्र के ४४ बच्चे रह रहे हैं और पंचकूला और चंडीगढ के प्रतिष्ठित स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं । उनका सारा खर्च संस्था के कोश और बाहर से दानियों द्वारा दी गई अनुदान की राशि से किया जाता है । विद्धार्थियों की हर तरह से पूरी सहायता की जाती है । संस्था द्वारा ही बच्चों के लिये टूयशन का प्रबंध किया जाता है । बच्चों की सेहत का भी यथासंभव ध्यान रखा जाता है । बच्चों का नियमत रूप से मैडिकल निरीक्षण किया जाता है । पढाई के साथ-साथ बच्चों के लिये खेल्-कूद और योगाभ्यास और नत्य आदि की भी वंहा व्यवस्था है । बच्चों को पढाई के अतिरिक्त दूसरे व्यवसायों जैसे कंपूटर, टाईपिंग, शोर्टहैंड , लडकियों के लिये ब्यूटि-कलचर, कूकिंग, सिलाई-कढाई इत्यादि भी सिखाये जाते हैं जो आगे चलकर उनके जीवन में काम आ सकें । गुलाटी साहिब की यह इच्छा रहती है कि सारे विद्दार्थी पढने में तेज बनें और अच्छी श्रेणियों में उत्तीर्ण हों । यह श्रेय उन्ही को जाता है कि अब तक सभी विद्दार्थी अच्छे अंक लेकर पास हुये हैं और कुछेक ने तो कीर्ति स्तंभ भी स्थापित किये हैं ।
श्री गुलाटी की यह विशेषता है कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, वह बहुत ही थोडे साधनों से और विपरीत परिस्थितियों में रहकर किया है । कोई व्यक्ति किसी संस्था के प्रति अपना पूरा मन लगाकर नित्य प्रयास करते हुए कितना काम कर सकता है, यह संस्था को देखने से ही मालूम होता है । आत्मीयता, सात्विकता और स्वच्छता की दृष्टि से सदन का वातावरण किसी परिवार से कम नहीं । सभी बच्चे छोटे-बढे जाति-पात और धर्म का भेद-भाव मिटाकर मिलजुल कर एकसाथ रहते हैं, एक साथ खेलते हैं, एक साथ पढते हैं और एकसाथ ही सारे त्योहार मनाते हैं । बच्चों के लिये खेलने-कूदने के लिये भवन के अंदर व बाहर हर-प्रकार के खेल की व्यवस्था है । बच्चे दूसरे स्कूलों में जाकर खेल-प्रतियोगिता अतः अन्य सांस्कतिक कार्यों में हिस्सा लेते हैं । बच्चों में पढने का शौक पैदा करने के लिये एक लायेब्रेरी भी बनाई गई है । स्टेट बैंक आफ इंडिया की तरफ से बच्चों को स्कूल ले जाने के लिये एक वैन और एक मारूति वैन भारतीय मूल की लंडन में बसी महिला कौशल्या देवी की तरफ से भेंट की गई है ।
श्री गुलाटी हिंदुस्तान मशीन टूलज, पिंजोर के रिटायर्ड डिपटी-जनरल मैनेजर हैं और एक तरह से अपनी पारिवारिक जिम्मेवारीयों से निवृत हैं । उनकी एक ही बेटी है -डा॰ शालिनी खन्ना जो शादी-शुदा है । वे और उनकी धर्म-पत्नी उषा अपना अधिक से अधिक समय सदन में ही बिताते हैं और सदन एवं बच्चों की पूरी देखभाल करते हैं । दरअसल वे अपनी संस्था और बच्चों को अपने से भी ज्यादा चाहते हैं । उनकी अब एक ही अभिलाषा है – कि सारे बच्चे पढ-लिख कर समाज के योग्य नागरिक बन जायें और अपने पैरों पर निर्भर हो, शादी कर एक सफल जीवन व्यतीत करें ।
जिस सादगी और सरलता से उन्होंने अपना जीवन व्यतीत करते हुये इस उम्र में भी इन जरूरतमन्द बच्चों के हित का भार उठा रखा है, वह निःसंदेह सराहनीय है । ऐसी ही सच्ची भावना के साथ परोपकारमय जीवन व्यतीत करने के कारण वे पंचकूला के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते हैं । वे ऐसी ही अन्य कई संस्थायों से भी जुडे हुये हैं और अपना पूरा योगदान दे रहे हैं ।
वे एक कर्मठ व्यक्ति और सक्रिय समाज-सेवी के रूप में जाने जाते हैं । ऐसे निःस्वार्थ तथा निर्लय समाज हितैशी जिस समाज और राष्ट्र में होंगे, वह समाज और वह राष्ट्र भला क्यों न उन्नति के शिखिर पर पंहुंचेगा । पंचकूलावासियों को उन पर गर्व है ।