आप अपना कीमती वोट किसे देगें ?
Posted on 03/26/2009 02:09 pm by Anjana Dattaसभी शासन पद्धतियों में से लोकतंत्र प्रणाली इसलिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है क्योंकि इसमें सरकार चुनने का अधिकार् पूर्णतया लोगों के हाथ में होता है। वे स्वेच्छा से अपने मत देने के अधिकार को प्रयोग करके किसी भी सरकार को बहाल करने या पद्धच्चुत कर सकते हैं ।किसी ओर शासन पद्धति में ऐसी सुविधा लोगों के पास कहां ?
ऐसा इसलिए कि प्रजातंत्र का मेरूदंड एक सामान्य वोटर होता है । प्रजातंत्र की मूलशक्ति और मूल संभावना मतदाता के हाथ में होती है क्योंकि वह अपने मताधिकार का प्रयोग करके अपनी मर्जी के ऐसे प्रतिनिधि चुन सकता है जो उसकी सुविधा तथा मर्जी की सरकार बनाए । अपने मताधिकार का स्वेच्छापूर्ण करके वह न केवल अपना ही अपितू सारे राष्ट्र का भाग्य विधाता होता है । पर यह सब तभी हो सकता है यदि मतदाता राष्ट्र के प्रति सजग हों और अपने उत्तरदायित्व को निबाहने के लिये अपनी दूरदर्शिता का परिचय दें । अपने मतदान देने की पवित्र धरोहर का प्रयोग करते समय किसी भी तरह की बर्ती गई नासमझी देश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है । प्रजातंत्र की सफलत इस बात पर निर्भर है कि मतदाता राष्ट्र की समस्याओं के प्रति कितना सजग है और उन्हें सुलझा सकने के लिए अपने हाथों मेंु उपस्थित ‘मतदान के अधिकार’ का कैसी सूझ-बूझ के साथ उपयोग करता है । जो लोग चुने जाने वाले हैं वे राष्ट्रीय हित को कितना सर्वोपरि मानते हैं ? यदि मतदाता अपने कीमती वोट को देते समय अपने उत्तरदायित्व को ठीक तरह से न समझ कर अथवा किसी तरह के प्रलोभनों में आकर अपने मतदान का दुरूपयोग करें, तो उसका परिणाम समस्त समाज को भुगतना पडेगा । यदि मतदाता अबोध, अशिक्षित और अनुत्तरदायी है तो वह अपने मतदान के महत्व और उसके दूरगामी परिणामों को कहां समझ पाएगा ? ऐसी दशा
में तो मत का दुरूपयोग होगा ही और आज हो भी रहा है । फलस्वरूप प्रजातत्रं के वो लाभ हमें नहं मिल रहे जो मिलने चाहिए थे । कई बार तो लोग सरेआम वर्तमान शासन व्यवस्था की तुलना में पिछली विदेशी पराधीनता के दिनों को इससे अच्छा कहने लगते हैं । आज की शासन व्यवस्था तथा में समाज में जो गिराव देखने को मिलता है, उसका वास्तविक कारण यही है कि मतदाता अपने मत का सही प्रयोग नहीं कर रहे । उनमें समझदारी तथा
दूरदर्शिता का अभाव है तभी तो सही प्रतिनिधि नहीं चुने जाते । आज के युग के सबसे बडे समाज सुधारक गायत्री परिवार के संस्थापक केवेदमुर्ति, तपोनिष्ठ युगऋषि पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं,”पत्तों को सूखते फूलों को मुरझाते देखकर हमें जड में पानी पहुंचाने की बात सोचनी चाहिए । प्रजातंत्र की जड मतदान के खेत में उगती है । यदि वहां पानी नहीं है, समझदारी तथा दूरदर्शिता का अभाव है तो सही प्रतिनिधि नहीं चुने जा सकेंगे और फिर न सही शासन व्यवस्था बनेगी और न अनुकूलता की अभीष्ट परिस्थितियां उत्पन होंगी ।” उनके अनुसार,” गतिरोध के केन्द्र बिदुं को समझा जाना चाहिए और यह अनुभव किया जाना चाहिए कि प्रजातंत्र का असली मालिक मतदाता है । उसे प्रशिक्षित करने, वोट का उपयोग कर सकने लायक समझदार बनाने के लिए घनघोर प्रयत्न करना उन सबका कर्त्तव्य है जो देश को सुखी, समुन्नत एवं सुविकसित देखना चाहते हैं । मालिक की समझदारी पर घर-परिवार की सुव्यवस्था निर्भर रहती है और वोटर की समझदारी पर प्रजातंत्री देशों की प्रगति । इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही अच्छा है ।”
इससे एक बात तो स्पष्ट है ही कि शासन में जिस मूल स्तोत्र से विकृतियां उत्पन्न होती हैं यदि उसे गहराई तक न समझा गया और परिवर्तन के केन्द्र बिन्दु की ओर ध्यान न दिया गया तो स्वच्छ और श्रेष्ठ शासन न मिल सकेगा और उनके बिना अति महत्व की समस्याओं के समाधान तथा अवरोधों का निराकरण संभव न हो सकेगा । वे आगे कहते हैं कि प्रजातंत्र का मूल है – वोटर का मतदान शासन का स्वरूप यहीं से निर्धारित होता है । आधार जैसा होगा, स्वरूप वैसा ही बनेगा । चिकनी मिट्टी और बालू-रेत के बने खिलौनों में अंतर रहेगा ही । बाजरे की और गेहूं की रोटी का स्वाद एक जैसा नहीं हो सकता । कपास और रेशम के बने वस्त्रों के अंतर प्रत्यक्ष दीखते रहेंगे । वोटर जिस स्तर के होंगे, प्रतिनिधि उसी स्तर के चुने जाएंगे और फिर निर्वाचितों की मनोवृत्ति तथा चरित्रनिष्ठा पर शासन का स्वरूप निर्धारित होगा और उस स्वरूप के आधार पर वे परिस्थितियां बनेंगी जो जन साधारण को प्रभावित करती हैं । सुधारों का मूल केद्रं यही है । बिगाड भी यहीं से आरंभ होता है । वोटरों में यदि वोट के स्वरूप, उत्तरदायित्व और परिणाम के बारे में दूरदर्शिता पूर्ण दृष्टिकोंण विकसित न हो सका तो गुड गोबर ही होता रहेगा । बालू में से तेल निकालने की तरह अन्य सारा सुधारात्मक प्र्योग-प्रयोजन एक प्रकार से निरर्थक ही सिद्ध होता रहेगा ।
इसके लिए उन्होने ‘हमें अपने मालिकों को शिक्षित करना चाहिए’ आंदोलन के अंतर्गत प्रत्येक विचार्शील, बुद्धिजीवी, देश्भक्त और परिवर्तनवादी को इस एक केंद्र पर केंद्रीभूत होना चहिए कि वोटर को उसे उपलब्ध वोट की पवित्रता तथा महत्ता समझाई जा सके ताकि वे किसी भी प्रकार के प्रलोभनों में न आकर अपने मत का निर्भीकता पूर्वक तथा निष्पक्ष रूप से कर सकें जिससे ईमानदार, योग्य और चरित्रवान प्रतिनिधि ही चुनाव जीत सकें जो देश को एक स्वच्छ और श्रेष्ठ शासन प्रदान कर सकें । देश की बागडोर ऐसे ही निष्ठावान् प्रतिनिधियों के हाथ में संभालनी चाहिए जिनका चरित्र, देश्-भक्ति तथा राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर किसी को संदेह न हो, जो इस कसौटी पर खरे उतर सकें जिनका आज के समय में बहुत अभाव है । आज के समय में गोखले, मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, सरदार पटेल और लालबहादुर शास्त्री जैसे नेता कहां जिन पर देश को गर्व महसूस हो ?
लेखिकाः
अंजना दत्ता,
#३१२/जी.एच. १,
मनसा देवी कम्पलैक्स, सैकटर ५,
पंचकुला
पिनः १३४ १०९