पहले दो, पीछे पाओ

  यह प्रशन विचारधीन है इक महापुरूष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही क्यों करता है ?  मनन के बाद मेरी निशिचत धारणा हो गई कि त्याग से बढकर प्रत्यक्ष और तुरंत फलदायी और कोई   धर्म नहीं है ।  त्याग की कसौटी आदमी के खोटे-खरे रूप को दुनियां के सामने उपस्थित करती है ।  मन  में जमे हुए कुसंस्कारों और विकारों के बोझ को हल्का करने के लिए त्याग से बढकर अन्य साधन हो नहीं सकता ।    आप दुनिया से कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, विद्दा, बुद्धि संपादित करना चाहते हैं, तो त्याग  कीजिए ।  गांठ में से कुछ खोलिए ।  ये चीजें बडी मंहगी हैं ।  कोई नियामत लूट के माल की तरह मुफ्त नहीं मिलती ।  दीजिए, आपके पास पैसा, रोटी, विद्दा, श्रद्धा, सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो, मुक्श् हस्त होकर दुनियां को दीजिए, बदले में आपको बहुत मिलेगा । गौतम बुद्ध ने राजसिंहासन का त्याग किया, गांधी ने अपनी बैरिस्टरी छोडी, उन्होने जो छोडा था, उससे अधिक पाया । विशव कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में कहते हैं,”उसने हाथ पसारकर मुझ से कुछ मांगा ।  मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक छोटा  दाना उसे दे दिया ।  शाम को मैंने देखा कि झोली में उतना ही छोटा एक सोने का दाना मौजूद था ।  मैं फूट-फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्य दे डाला, जिससे मैं भिखारी से राजा बन जाता ।”

 ४१                              अखन्ड ज्योति-मार्च १९४०, पृष्ठ ९