मौसम विभाग के ये प्राकॄतिक यंत्र
Posted in Uncategorized on 05/28/2010 10:35 am by Anjana Datta आजकल गर्मी ने सभी का बुरा हाल कर रखा है । हर कोई इस तपती गर्मी से छुटकारा पाने के लिये मौनसून का बडी बेस्बरी से इंतजार कर रहा है । कब बारिश आये और इस नामराद गर्मी से छुटकारा मिले । सुबह जब भी हम समाचार-पत्र पढने बैठते हैं तो सबसे पहले नजर आज का तापमान वाले कालम पर जाती है । मौसम विभाग द्वारा मौसम संबधी दी गई जानकारीयां हासिल कर ही इत्मिनान से कोई अन्य खबर पढने का मन करता है । इसी तरह जब भी टैलीविजन चालू किया जाता है मौसम का हाल जान कर ही कोई अन्य कार्यक्रम देखने को मन करता है, जब बंद करना हो तब भी मौसम का हाल जानकर ही उसे बंद किया जाता है ।
सच तो यह है कि मौसम के साथ हमारी दिनचर्या इस तरह जुडी हुई है कि इसके बगैर हम कुछ कर ही नहीं पाते । कोई नया काम शुरू करना हो, कहीं जाना हो या किसी ने आना हो तो सर्वप्रथम ध्यान मौसम की तरफ ही जायेगा । यदि मौसम ठीक हुआ तो ही हम अमुक कार्य कर पायेंगे अन्यथा नहीं, हम सबका नजरीया यही रहता है । यदि मौसम ठीक न हुआ तो सब कुछ धरा का धरा ही रह जायेगा और सारा मजा किरकरा सा हो जायेगा । मौसम साफ है तो हम कपडे धोयेंगे, घर की अंदर-बाहर से सफाई करवाना चाहेंगे नहीं तो नहीं वगैरह-वगैरह । वाह रे मौसम !
वास्तव में मौसम के साथ हमारी दिनचर्या किस प्रकार गुंथी हुई है, इसका अनुमान लगाना नमुमकिन है ।
ध्न्यवाद हो आजके वैज्ञानिक युग का जिसने मौसम सबंधी भविष्यवाणि करने के लिये अत्याधुनिक उपकरण और सयंत्र खोज निकाले हैं जो आने वाले मौसम के मिजाज के बारे में सटीक जानकारी उपल्बध कराने में काफी हद तक हमारी मदद करते हैं, चाहे उनके अनुमान कभी-कभार चूक भी जाते हैं । परंतु क्या आपने सोचा है जब विज्ञान ने इतनी तरक्की नहीं की थी और लोग इतने पढे-लिखे भी नहीं होते थे, तब वे किस प्रकार मौसम के बारे में जानकारी हासिल कर पाते थे? उनका जीवन भी तो मौसम से उसी प्रकार प्रभावित होता होगा जैसा कि हमारा । परंतु वे मौसम के बारे में कैसे अनुमान लगाते होंगे?
दरससल वे मौसम के बारे में व अन्य प्रकॄतिक आपदाओं के बारे में जानकारी हासिल करने में पूर्णतया प्रकॄति पर ही निर्भर करते थे जो ज्ञान उन्हें उनके पूर्वजों द्वारा दिया जाता था और जो सौ प्रतिशत ठीक सूचना देता था । वह था अपने पालतू पशु-पक्षीयों और जीव-जंतुओं के क्रिया-कलापों को समझकर उनके बदलते व्यवहार से मौसम संबधी सारी जानकारी वे अपने इन्हीं अनुभव से प्राप्त कर लेते थे और अपना बचाव कर लेते थे । ये चलते-फिरते नन्हे-मुन्हें प्रकॄति के यंत्र अब भी आने वाले मौसम के बारे में इतनी सटीक जानकारी रखते हैं कि उनके सामने सारे आधुनिक यंत्र एवं उपकरण भी सब बेकार प्रतीत पडते हैं । पर किसी का ध्यान इन जीव-जंतुओं की तरफ जाता ही नहीं जो इंसान को प्रकॄति की तरफ से एक अनमोल तोफा है । जरा इनकी क्षमता तो जानें यह किस कदर ये इंसान से बेहतर प्रकॄति के नजदीक हैं और आने वाली घटनाओं की जानकारी रखने में वे इंसान से किस कदर अभी भी आगे हैं ;
यदि चींटियां अपने बिलों से निकलकर तेजी से एक ही कतार में आवागमन करें, मेंढक जोर-जोर से टरार्ना, गायें मिट्टी चाटना शुरू कर दें, तथा बैल और बछडे अपने शरीर के रोओं को फैलाकर विचित्र ढंग से आवाजें निकालना शुरू कर दें तो समझो वर्षा आने ही वाली है । जंगली हाथी अपनी सूंड आसमान की तरफ कर उंचे स्वर से दहाडें, सफेद कबूतर एक कतार में बहुत उंचाई पर उडान भरें, तो यह बिन मौसम बरसात के आगमन का संकेत है ।
यदि रीवा पक्षी उंचे स्वर से बोले, तो समझो वर्षा अभी दूर है, यदि नजदीक से बोले तो इसका अभिप्राय है वर्षा निकट ही है । मौर यदि विशेष ढंग से बोल रहा है और साथ में चहक भी रहा है, तो इसका आश्य है कि रिमझिम होने ही वाली है । ठीक इसके विपरीत अगर गोह बोलने लगे तो यह अनुमान लगाना चाहिये कि वर्षा अभी नहीं होने वाली । यदि काली चींटियां जंगलों में काफी संख्या में निकलें, तो यह अनुमान लगाना चाहिये कि गर्मी का तापमान आने वाले दिनों में और बढेगा । तिब्बत और दार्जलिंग की पहाडी सारस को तो मौसम की विशेषज्ञ ही माना जाता है क्योंकि उसे भीषण वर्षा की जानकरी बहुत पहले ही हासिल हो जाती है और वह आकाश में बिना किसी बादल के होने पर भी किसी सुरक्षित स्थान, गुफा या चट्टान में चली जाती है जिसे देखकर वहां के लोग भी अपने आपको किसी सुरक्षित स्थान में चले जाने में देर नहीं लगाते । जापान में बहुत से लोग एक ऐसी मछली को अपने घर में पालते हैं जो अपने शरीर के हर रंग को बदल कर मौसम के पूर्वानुमान का संकेत देती है – यदि उसके शरीर का रंग लाल है, तो यह बारिश आने का संकेत है, यदि हरा है, तो इसका अभिप्राय है सर्दी बढेगी, यदि सफेद रंग है, तो यह गर्मी बढने का संकेत है ।
यही नहीं । मौसम के अनुमान लगाने में पेड-पौधे भी किसी तरह से पीछे नहीं । कुछेक फूलों के पौधों के फलने-फूलने से भी मौसम का सही अनुमान लगाया जा सकता था । जैसे यदि कांस के पौधे पर फूल आने लगें, तो यह तह है कि वर्षा नहीं होगी । कडी गर्मी में खिलने वाला अमलतास के सुंदर पीले फूल खिलने के समय के आधार पर भी मौनसून के आने का अंदाजा लगाया जा सकता है । एक अनुमान के अनुसार यदि दही जल्दी खट्टा हो जाये, तो यह भी जल्दी बारिश का संकेत है ।
और तो और, इन मूक जीव-जंतुओं को ग्रहण, भूकंप, तूफान और सुनामी जैसी प्राकॄतिक घटनाओं का भी पूर्वाभास हो जाता है और इनका व्यवहार असमान्य सा हो जाता है । एक अत्यंत उच्छृंखल सा बंदर भी ग्रहण के पूर्व मनुष्य की भांति खाना-पीना त्याग कर एकदम एक सन्यासी की तरह बन जाता है । अन्य पशु-पक्षी भी ग्रहण के दौरान अपने सारे क्रिया-कलापों को त्याग कर किसी एकांत स्थान में चले जाते हैं जैसे यह सब कुछ समझते हों ।
भूकंप के पूर्व तो पालतू पशु अपना बंधन तक तोडते देखे गये हैं । कुछेक पालतू जानवरों को तो किसी की मॄत्यु तक का भी पूर्वाभास हो जाता है और अमुक घर के सामने अजीबो-गरीब ढंग से रोना शूरू कर देते हैं जिसे देख कर किसी अनहोनी की आशंका से मन डर सा जाता है ।
यह सब इस बात के सूचक है कि यह मूक जीव-जंन्तु जिनका लोगों को सडकों पर यूं घूमना भी गंवारा नहीं, जिन्हें कोई दो वक्त रोटी का एक टुकडा डालना भी पसंद नहीं करता, वो भविष्य संबंधी ज्ञान में मनुष्य से कितने आगे हैं और प्रकॄति के कितने करीब । इंसान ने इतना पढ-लिख कर ही भी मौसम संबधी सटीक जानकारी हासिल नहीं कर सका जो यह बेजुबान जानवर को कुदरत से विरासत में मिली है ।
यह समय है मनुष्य इन बेजुबान जानवरों की महत्ता समझे और इनके साथ उचित व्यवहार करना सीखे । इनके साथ दोस्ती कर वह बहुत कुछ सीख सकता है ।
अंजना दत्ता,