जिस देश में गंगा बहती है

यत्र गंगा महाभागा स देश्स्तत्त्पोवनम ।
सिद्ध्क्षेत्रं तु तन्न्ज्ञेयं गंगातीरं समाश्रितम ॥
कूर्म पुराण
अर्थात जहां पर महाभागा गंगा है, वह देश तपोवन के समान होता है । उसको सिद्ध क्षेत्र जानना चाहिए ।
गंगा भारत की राष्ट्रीय नदी है । परंतु भारतवासीयों के लिए यह एक मात्र नदी ही नहीं है । यह उनके लिए देवी मां है, उनकी जीवनदायनी है जिसका अमृतुल्य जल उन्हें मुक्ति प्रदान करता है । गंगा भारतीय संस्कृति का आधार है । यह भारत की शान है, आन है और जान है । गंगा सदैव से भारत का गौरव रही है । इसमें भारतमाता की चेतना समाई हुई है । प्रचीनकाल से लेकर अब तक करोडों लोगों की आस्था, श्रद्धा, भक्ति एवं प्रेरणा का स्त्रोत रही गंगा मैया हर भारतीय के रोम-रोम में समाई हुई उनके मन में दिव्यता एवं पवित्रता का संचार करती है ।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है,”स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी ।”
अर्थात – जल स्त्रोतों में मैं जाह्नवी (गंगा) हूं ।
विष्णु भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई परम पावनी गंगा सदैव से ही ऋषियों, मुनियों एवं तपस्वीयों की श्रद्धा का आधार रही है । ऐसी मान्यता है कि गंगातट पर की गई तपस्या-साधना की गति तीव्रगामी होती है । इसीलिए सप्तऋषियों ने भी अपनी तपस्थली प्रचंड तपस्या के लिए दिव्य हिमालय की छांह तले बहती गंगा को ही चुना और सिद्धीएं प्राप्त की । इसी दिव्य विशेषता से आकर्षित होकर भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और श्त्रुघन ने भी अपनी तपस्या के लिए गंगा का किनारा ही चुना । महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाग्रंथ रामायण की रचना गंगा तट पर स्थित बिठूर में रहकर ही की थी । महाभारत की कहानी भी गंगामाता से ही आरंभ होती है । इसके अतिरिक्त सम्राट अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन से लेकर तात्याटोपे आदि के जीवन की अनेकों ऐतिहासिक घटनाएं गंगातट से जुडी हुई हैं ।
हिंदुओं के लिए तो यह मां से भी बढकर है । उनके लिए तो यह एक देवी स्वरूपा है जिसका शीतल आंचल, सदेह एवं सजीव वात्सल्य उन्हें दिव्यता प्रदान करता है ।
गंगा हिंदु धर्म का परिचय है । हिंदु-धर्म की कितनी ही मान्यताएं एवं संस्कार गंगा से जुडी हुई हैं । हिंदु परिवार में कोई भी मागंलिक कार्य गंगाजल के बिना संपन नहीं हो सकता । प्रत्येक हिंदु-परिवार में गंगाजल अवशय पाया जाता है । ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति के अंतिम समय में उसके मुंह में गंगाजल डाला जाए तो वह सीधा मोक्ष प्राप्त करता है । मरने के बाद भी हिंदु अपने सगे-संबधिओं की अस्थियां गंगा में विसर्जित करने हरिद्वार जाते हैं ताकि उनकी आत्मा को सदगति प्राप्त हो ।
गंगा भारत का इतिहास है, त्रिकाल का प्रतिनिधि है और महाकाल का प्रसाद है । इसकी जलधारा में भारतीय संस्कृति अविराम प्रवाहित होती रही है । वास्तव में भारतीय संस्कृति एवं इतिहास की कल्पना गंगा मैया के बिना दुष्कर है ।
पौराणिक आख्यान के अनुसार स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण किसी विशेष प्रयोजन से हुआ था । एक कथानुसार राजा सगर के साठ हजार पुत्र किसी तापवश अपने कुकर्मों की आग में जल रहे थे । उनकी कष्टनिवृत्ति केवल गंगाजल से ही हो सकती थी । परंतु गंगा को धरती पर लाए कौन ? इसके लिए सगर के वंशज भगीरथ ने कठोर तप करके गंगा को धरती पर लाने के लिए मना लिया । परंतु उनके वेग को धारण कौन करे ? इसके लिए भगीरथ ने भोले शंकर को मनाने के लिए दोबारा कठोर तप किया जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर गंगा को अपनी जटा में धारण करने के लिए तैयार हो गए । उनके कठोर तपश्चर्या एवं पुरूषार्थ से गंगा ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी के पावन दिन को धरती पर गौमुख जहां गंगोत्री का मंदिर है, अवतरित हुई । यह दिवस गंगा दशहरा के नाम से मनाया जाता है । इस साल २ जून को गंगा दशहरा है । इस दिन लाखों लोग गंगा में स्नान करके, गंगाकिनारे पूजा अर्चना करके दान-दक्षिणा देते हैं । आज ही के दिन गायत्री जयंती भी मनाई जाती है क्योंकि आज ही के दिन विश्वामित्र ने गायत्री माता का तप करके उसे भी धरती पर अवतरित कराया था ।
गंगा का जितना धार्मिक महत्व है विश्व में किसी और नदी का नहीं है । प्रख्यात इतिहास लेखक अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आइने अकबरी’ मे लिखा है कि बादशाह अकबर गंगाजल को अमृत कहते थे और पीने के लिए सदैव गंगाजल का ही प्रयोग किया करते थे । विशवभर के वैज्ञानिकों ने भी गंगाजल की दिव्यता को स्वीकारा है । उनके अनुसंधान के अनुसार गंगाजल मात्र जल नहीं है, बल्कि अमृत है । विशव में इतना पवित्र जल केवल उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव में ही पाया गया है । किंतु वे यह देखकर हैरान हैं कि ध्रुवों के जल में भी एक वर्ष बाद कृमि दिखाई देने लग जाते हैं जबकि गंगाजल सौ साल भी उसी तरह शुद्ध और निर्मल नजर आता है ।
गंगा की आध्यात्मिक महत्ता और महिमा से सभी भारतीय धर्मशास्त्र, पुराण और वेद और ग्रंथ ओत-प्रोत हैं । महाभारत में गंगा को पापनाशिनी माना गया है । देवी भागवत में भी गंगा को पापों को धोने वाली कहा गया है । जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है, उसी प्रकार सैकडों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगास्नान किया जाए तो उसका जल उन सब पापों को भस्म कर देता है ।
पुनाति कीर्तिता पापं द्रष्टा भद्रं प्रयच्छति ।
अवगाढा च पीला च पुनात्यासप्तमं कुलम ॥
अर्थात गंगाजी का नाम लेने मात्र से पाप धुल जाते हैं और दर्शन करने पर सात पीढियों तक को वह पवित्र कर देती है ।
सतयुग में तो सभी तीर्थ पुण्यदायक-फलदायक माने गए हैं । त्रेता में पुष्कर का महत्व अधिक माना गया है । द्वापर में कुरूक्षेत्र की विशेष महिमा बताई गयी है और कलियुग में गंगा की ।
अग्नि पुराण में गंगा को सर्वोत्कृष्ट जलतीर्थ माना गया है ।
‘नास्तिम विष्णु समं ध्येयं तपो नानशनात्परम ।
नास्त्यारोग्यसमं धन्यं नास्ति गंगासम सरित॥
अर्थात भगवान के समान कोई आश्रय नहीं । उपवास के समान तप नहीं । आरोग्य के समान सुख नहीं और गंगा के समान कोई जलतीर्थ नहीं है ।
तीर्थानां तु परं तीर्थ नदीनामुत्तता नदी ।
मोक्षदा सर्वमृतानां महापातकिनामपि ॥
अर्थात गंगा तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ, नदीयों में उत्तम नदी तथा संपूर्ण महापातिकियों को भी मोक्ष देने वाली है ।
न गंगा सदृशे तीर्थ न देवः केशवात्परः ।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति अवमाह पितामहः ॥
ब्रह्माजी के कथानुसार गंगा के समान तीर्थ, श्री विष्णु से बढकर देवता तथा ब्राह्मणों से बढकर कोई पूज्य नहीं है ।
गंगाजल का केवल आध्यात्मिक महत्व ही नहीं है बल्कि शारीरक और मानसिक रोगों के निवारण के लिए भी इसे एक अचूक ओषधि माना गया है ।
आयुर्वेद में गंगाजल को अमृत के तुल्य बहुगुणयुक्त पवित्र, उत्तम, आयुवर्द्धक, सर्वरोगनाशक, बलविर्यवर्द्धक, परम पवित्र, हृदय को हितकर, दीपन, पाचन, रूचिकारक, मीठा, उत्तम पथ्य और लघु होम माना गया है जो भीतरी दोषों को नाश करने वाला, बुद्धिजनक, तीनों दोषों का नाश करने वाला, सभी जलों से श्रेष्ठ माना गया है । आयुर्वेद में गंगाजल को शारीरिक और मानसिक रोगों का निवारण करने वाला और आरोग्य व मनोबल में अभिवृद्धि करने वाला कहा गया है ।
ऐसा विश्वास है कि गंगाजल में अति विशिष्ठ शौर्य, समृद्धि और सृजनकारी शक्तियां हैं जो अन्य किसी जल में नहीं पाई जाती । विशवभर के वैज्ञानिकों ने एकमत से स्वीकारा है कि गंगा एक अपूर्व नदी है परंतु यह कोई नहीं जानता कि इस जल में अपूर्व गुण कहां से और कैसे आए । कहा जाता है कि सिकंदर भी गंगा के किनारे बसे लोगों पर आक्रमण करने का साहस नहीं जुटा पाता था ।
लेकिन यह बहुत दूर्भाग्य की बात है कि गंगा एक दिव्य नदी होते हुए भी आज के अंधाधुंध औद्दोगिकरण के कारण प्रदूषण के कुप्रभाव से अछुती नहीं रह सकी है । मां गंगा को प्रदुष्णमुक्त रखना प्रत्येक भारतवासी का परम कर्त्तव्य ही नहीं, अपितु परम धर्म भी है ताकि भारत की आध्यात्मिक और संस्कृति की प्रतीक गंगा मैया अपनी दिव्य पावनता में सदैव गतिमान रहकर भारतवासीयों को सांसारिक ताप से पीडित सारी मानवता को इसी तरह युगों-युगों तक शांति व मुक्ति प्रदान करती रहे ।

अंजना दत्ता
#३१२/ग.ह.सोसाइटी न.१,
मनसा देवी कम्पलैक्स, सेकटर ५,
पंचकुला (हरियाणा) ।
पिन- १३४ १०९ द्

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