सदवाक्य
Posted in Uncategorized on 04/19/2009 02:09 pm by Anjana Datta
कर्म करने में मनुष्य पूर्ण स्वतन्त्र है । पर परिणाम भुगतने के लिये वह नियोजक सत्ता के आधीन है ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
आदमी की कमर झुकी हुई हो तो कोई बात नहीं, किंतु उसका सिर झुका हुआ नहीं होना चाहिए ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
दीपक छोटा ही सही, अल्प मूल्य का ही सही, पर वह प्रकाश का अंशधर होने के नाते सुदूर फैलाव को चुनौती देता है और निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है । श्रीराम शर्मा आचार्य
देवालय टूट कर खण्डहर बन सकते हैं, गिर कर समय के साथ नष्ट हो सकते हैं, लेकिन उत्तम ज्ञान और सदविचार कभी नष्ट नहीं होते ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गहिर्त और हेय समझते हैं, जिन्हें केवल निंदा और भर्तसना ही मिलती है । प्यार करने योग्य वही लोग हैं, जिन्हें स्नेह-सद्भभाव देकर तुम अपने को गौरवान्वित करोगे ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
मांगो मत, चाहो मत,
देकर ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करो ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
जब कभी ऐसा आभास हो कि आपको किसी ने आवाज दी है, किन्तु आस-पास खोजने पर भी किसी पुकारने वाले का पता न चले, तो समझ लीजिये कि वह अपनी ही अन्तरात्मा की पुकार है । इसकी अवहेलना न करें ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
मनोयोग और परिश्रमशीलता यदि साथ रहे तो व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने में सफल हो जाता है ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
सारे विश्व को अपना घर, मनुष्यमात्र को अपना स्वजन, नेकी को अपना धर्म और ऊंचा रहने में अपना गौरव समझो ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
विकसित व्यकित्त्व की एक ही पहचान है – उच्च चरित्र ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
सच्चा मित्र हीरे के समान बहुमूल्य है, भले ही वह संख्या में कम हों । झूठे-मित्र तो सडे पत्तों की तरह दुर्गंध फैलाते और जगह घेरते हैं, भले ही वे संख्या में बहुत हैं ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
उत्साह से बढकर संसार में और कोई बल नहीं है । दुःख से डरने वाले मनुष्यों को चाहिए कि वह दूसरों को दुःख न दें ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
श्रेष्ठ प्रवृत्तियां बढाने के लिए किए जाने वाले हितकारी श्रेष्ठ कर्मों को ही यज्ञ कहते हैं ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
आशा सर्वोत्तम प्रकाश और निराशा घोर अंधकार है ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
जो समय गंवाता है, उसे जीवन गंवाने वाला कहा जाता है ।
श्रीराम शर्मा आचार्य
अनीति जन्य संपन्नता समाज को दूषित करती है ।
विघ्न और बाधाएं महान और क्षुद्र लोगों की परीक्षा के लिए आती हैं ।
पद लोलुपता से बढकर लोकमंगल के कार्यों में और कोई विघ्न नहीं ।
केवल भले बनकर संतोष मत करो, कुछ ऐसा भी करो जिसे भलाई कहा जा सके ।
दृढ निशचय और आत्मविशवास में वह शक्ति है जो असंभव को भी संभव बना देता है ।
आचारः प्रथमो धर्मो, नृणां श्रेयस्करो महान ।
मनुस्मृति
काली परछाइयों से मत डरो । वे बताती हैं कि आसपास ही कहीं प्रकाश की सत्ता मौजूद है ।
प्रत्येक मनुष्य को दो प्रकार की शिक्षाएं मिलती हैं । एक वह जो वह दूसरों से ग्रहण करता है और दूसरी वह जो वह स्वंय अपने को देता है और निशचय ही दूसरी शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण है ।
गिबन
उत्तम आचार ही सबसे पहला धर्म है और मनुष्यों के लिए महान कल्याणकारी है ।
वास्तविक आनंद लौकिक लिप्साओं और सांसारिक भोग-विलासों में नहीं है । वह मोक्ष और मोक्ष की स्थिति में है । उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिए, वही मानव जीवन का ल्क्ष्य है । उसी में शांति और तृप्ति मिलेगी ।
मनुष्य के चरित्र (आचरण) से ही पता चलता है कि वह कुलीन है या कुलहीन, सच्चा वीर है अथवा यूं ही डींगें मारने वाला तथा पवित्र है या अपवित्र ।
मनुष्य को कुछ ऐसी कलाएं भी जाननी चाहिए, जिससे आपत्तिकाल में भी अपना गुजारा कर सके । पाण्डवों का अनुभव उनके वनवास काल में काम आया । भीम ने रसोइये का, अर्जुन ने नर्तक का, द्रौपदी ने दासी क्का, इसी प्रकार अपने-अपने कौशल ले अनुरूप विराट नगर में काम प्राप्त कर लिये थे ।
एक राजा ने बडे पुत्र को युवराज बनाने की अपेक्षा अधिक शीलवान को नियुक्त करने की प्रथा आरम्भ की और उसके लिए परीक्षा रखी । पांच राजकुमारों के लिए भोजन परोसे गये । जैसे ही वे थाली पर हाथ डालने वाले थे कि चार शिकारी कुत्ते उन पर छोड दिए गए । चार राजकुमार तो घबराकर भाग खडे हुए, पर सब से छोटा यथास्थान बैठा रहा । उसने चार भगौडे राजकुमरों के थाल कुत्तों के सामने सरका दिये । वेभी खाते रहे और छोटे राजकुमार ने भी पेट भर लिया । निरीक्षक सबकी कार्यविधि देखते रहे । छोटे ने कहा,”कुत्ते उसे काटते हैं जो अकेले खाता है । बांटकर खाने वाले को कोई जोखिम नहीं उठाना पडता ।” इस बुद्धिमानी पर सभी प्रसन्न हुए और उसे ही उत्तराधिकारी चुना ।
तुम्हारे पास दो रूपये हों तो एक की रोटी खरीदो, दूसरे की अच्छी पुस्तक । रोटी जीवन देती है और अच्छी पुस्तक जीवनकला ।
अज्ञात
किसी व्यक्ति की महानता की परख यह है कि वह अपने से छोटों के लिए क्या सोचता और क्या करता रहा ।
जीवन का, स्थिरता का कोई भरोसा नहीं । इसलिए यही उचित है कि फिर कभी की प्रतीक्षा किए बिना हम श्रेष्ठ कार्य अविलंब करें ।
लोगों को जो उपदेश देना है उसे पहले अपने जीवन में उतार लो । जीवन का स्वरूप हजार प्रवचनों से बढकर प्रभावी होता है ।
श्रद्धा अर्थात सदभाव, प्रज्ञा अर्थात सदज्ञान एंव निष्ठा अर्थात सत्कर्म । तीनों का समविन्त स्वरूप ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है ।
वांछितार्थ फलं सौख्यमिंद्र्याणान्च मारणम । एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढ्स्य योगिनः ।
– शिव संहिता
अर्थात अभीष्ट प्रयोजनों की प्राप्ति सुख तथा इन्द्रिय निग्रह यह सब सफलताएं योग साधक को मिलती हैं ।
न योगो नभसः पृष्ठ न मूमौ न रसातले । एक्यं जीवात्मानों राहुर्योमं योग विशारद ॥
-देवी भागवत
अर्थात – योग न आकाश में है, न पृथ्वी में और न रसातल में योगतत्व के ज्ञाता जीवात्मा तथा परमात्मा की एकता को ही योग कहते हैं ।
‘बुढापे का शेष जीवन शांतिपूर्ण आत्मचिंतन तथा भगवान का भजन करने के लिए होता है, धक्के खाने के लिए नहीं ।’
श्रीराम शर्मा आचार्य
07/18/2009 at 12:22 am
सुन्दर अति सुन्दर