कुछेक रोचक प्रसंग

दुष्ट परिस्थितियों की तरह बंदर भी बडे दुष्ट होते हैं । एक बार स्वामी विवेकानंद काशी में किसी जगह जा रहे थे । उस स्थान पर बहुत से बंदर रहते थे, जो आने-जाने वालों को अकारण ही तंग करने में बडे विख्यात थे । उनके साथ उन्होंने वही किया । स्वामी जी का रास्ते से गुजरना अच्छा न लगा । वे चिल्लाकर उनकी ओर दौडे और पैरों में काटने लगे । उनसे छूटकारा पाना असंभव प्रतीत हुआ । वे तेजी से भागे, पर वे जितना भागते, बंदर भी उतना दौडते और काटते । तभी एक अपरिचित स्वर सुनाई दिया,”भागो मत । सामना करो ।” बस वे खडे हो गए और बंदरों को ऐसी जोर की डांट लगाई कि एक घुडकी में ही बंदर भाग खडे हुए । जीवन में जो कुछ भयानक है, उसका हमें साहसपूर्वक सामना करना पडेगा । परिस्थितियों से भागना कायरता है, कायर पुरूष कभी विजयी नहीं होगा । भय, कष्ट और अज्ञान का जब हम सामना करने को तैयार होंगे, तभी वे हमारे सामने से भागेंगे ।

रामकृष्ण परमहंस के पास नरेंद्र को आते काफी अवधि हो चुकी थी । एक दिन वे अपने शिष्यों से बोले,”अब तक तो नरेंद्र के पास सब कुछ था, पर अब मां इसे बहुत दुःख देंगी । क्यों ? क्योंकि उन्हें इसका विकास करना है ।” नरेंद्र को काफी दुःख-वेदनाएं सहन करनी होंगी । तब ही तो वह लोक-शिक्षण हेतु गढ पाएगा अपने आप को । उनने अपने शिष्यों को बताया कि दुःख ही भावशुद्धि करते हैं । दुःख ही व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाते हैं । नरेंद्र के ऊपर दुःखों की बाढ आ गई । सब कुछ छिन गया । रोटी के लिए तरस गए । कई गहरी पीडाएं एक साथ आईं । उनने अपनी बहन को आत्महत्या करते देखा, मां का रूदन देखा । रामकृष्ण उनकी हर पीडा में दुःख भी व्यक्त करते थे, पर जानते थे, यह सब जरूरी है । सामयिक है । इसी ने नरेंद्र को स्वामी विवेकानंद बनाया ।

स्वामी विवेकानंद उन दिनों अमेरिका प्रवास में थे । वे अपना भोजन अधिकतर स्वयं ही पकाते थे । एक दिन उन्होंने अपना भोजन बनाकर तैयार क्या । इतने में ही कुछ भूखे बालक उधर आ निकले । स्वामी जी ने सारा भोजन उन बालकों में बांट दिया और इससे उन्हें बडी प्रसन्नता हुई । पास ही एक अमेरिकन महिला खडी थी । उसने पूछा,”स्वामी जी । आपने बिना कुछ खाए ही सारा भोजन इन बालकों में क्यों बांट दिया ?” वे बोले,”माता जी । पेट की भूख से बडी होती है आत्मा की भूख और आत्मा के तृप्त होने पर जीवन की समस्त क्षुधाएं एक बार में ही शांत हो जाती हैं । मैंने अपनी वास्तविक भूख शांत करने के लिए ही भोजन बच्चों में बांट दिया ।”

आलम बाजार मठ में नवीन संन्यासी संघ की स्थापना के समय स्वामी विवेकानंद ने सन्यासियों के लिए कुछ नियम बनाए (१८९८)। ये नियम आज भी उसी तरह पालन किए जाते हैं । आज समाज में संन्यासियों की भीड है । उसमें पलायनवादी, सुख की चाह में आए लोग ज्यादा हैं । यदि हम इन नियमों को देखें तो पता चलेगा कि उस महामानव की दृष्टि क्या थी ? स्वामी जी ने कहा था,”आहारसंयम के बिना चित्तसंयम असंभव है । संन्यासी अतिभोजन से बचें । दृढतापूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है । प्रातःकाल जल्दी उठना, ध्यान, जप करना, तपस्वी जीवन में निरत रहना, बातचीत मात्र धर्म के विष्यों पर ही करना-यह हर संन्यासी के लिए अनिवार्य है । समाचारपत्र पढना या गृहस्थों के साथ मेल-जोल ठीक नहीं । संन्यासी धनी लोगों के साथ कोई संबंध न रखें । उनका कार्य तो गरीबों के बीच है । हमारे देश के सभी संप्रदायों में धनिक लोगों की खुशामद, उन्ही पर निर्भर होने का भाव आ जाने से वे प्राणहीन हो चले हैं । किसी भी गृहस्थ को साधुओं के बिस्तर पर न बैठने दें । भोजन की व्यवस्था दोनों की अलग-अलग हो । जब भी तुम देखो कि तुम इस आदर्श से पिछड रहे हो, कठोर जीवन के अनुपयुक्त हो, तो बेहतर होगा कि पुनः गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर लो । संन्यास को कलुषित मत करना ।”
आज की परिस्थितियों में सच्चे संन्यासी ढूंढे जाने चाहिए ।
एक पादरी जहाज से यात्रा कर रहे थे । जहाज ने एक द्वीप के पास लंगर डाला । पादरी ने सोचा इस द्वीप पर कोई होगा तो उसे प्रार्थना सिखा आयें । वहां उन्हें केवल तीन साधु मिले । उनसे पूछा,”कुछ प्रार्थना-उपासनाकरते हो ?” उन्होंने बताया “हां । हम तीनों ऊपर हाथ उठाकर कहते हैं,’हम तीन हैं । तुम तीन हो । तुम तीनों हम तीनों की रक्षा करो ।” पादरी हंसे, बोले,”क्या पागलपन करते हो, तुम्हें प्रार्थना करनी भी नहीं आती ।” भोले साधुओं ने प्रार्थना सिखाने का आग्रह किया । पादरी ने उन्हें बाइबिल के आधार पर प्रार्थना करना सिखाया । अभ्यास हो जाने पर वैसा ही करने को कहकर जहाज पर आ गये । जहाज चल पडा । दूसरे दिन पादरी जहाज के दैक पर टहल रहे थे । पीछे से आवाज सुनाई दी,”ओ पवित्र आत्मा रूको ।” पादरी ने देखा वे तीनों साधु पानी पर बेतहाशा दौडते पुकारते चले आ रहे थे। आशचर्यचकित पादरी ने जहाज रूकवाया, उनसे इस प्रकार आने का कारण पूछा । वे बोले,”आप हमें प्रार्थना सिखा आये थे, रात में हम सोये तो भूल गये । सोचा आपसे ठीक विधि पूछ लें, इसलिए दौड आये ।” पादरी ने पूछा,”पर आप पानी पर कैसे दौड सके ?” उन्होंने कहा,”हमने भगवान से प्रार्थना की, कहा -हम अनजान हैं, पवित्र पादरी जो सिखा गये थे, भूल गये । दौड हम लेंगे, डूबने तुम मत देना । बस, इतना ही कहा था ।” पादरी ने घुटने टेक कर उनका अभिवादन किया और कहा,”आप जैसी प्रार्थना करते हैं, वही सही है, मैं ही गलत समझा था । प्रभु आपसे प्रसन्न हैं । वे तीनों सन्तुष्ट होकर पादरी का आभार प्रकट करके जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये । सर्वव्यापी भगवान सबके भाव समझता है, उसी आधार पर मान्यता देता है ।

आंखें खुली हों तो पूरा जीवन ही विशवविद्दालय है । जीवन का हर क्षण स्वयं में विशव की कोई न कोई विद्दा समेटे है और फिर जिसे सीखने की ललक है, वह प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक घटना से सीख लेता है । प्रकृति के आंगन में हो रही हर हलचल उसे कोई न कोईअ नई सीख देती है । याद रहे कि जो इस तरह नहीं सीखता है, वह जीवन में कभी कुछ नहीं सीख पाता । महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन कहा करते थे,”हर व्यक्ति, जिससे मैं मिलता हूं, किसी न किसी बात में मुझसे श्रेष्ठ है । वही मैं उससे सीखने की कोशिश करता हूं ।” उन्हीं के जीवन का एक प्रंसग है । वे किसी दूसरे देश में एक प्रतिष्ठित विशविद्दालय में गए हुए थे । इस विशवविद्दालय ने उनके लिए एक व्याख्यानमाला का आयोजन किया था । उन्हें सुनने के लिए विभिन्न विष्यों के विद्वान, राजनेता, उच्च पदाधिकारी, सभी पधारे थे । एक दिन सायं वे अपने व्याख्यान को समाप्त कर घूमने के लिए निकले । राह में उन्होंने देखा कि एक कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था । उस कुम्हार की कारीगरी उन्हें विलक्षण लगी । जीवन और जगत के स्रटा की भांति वह भी एक नवीन सृष्टि गढ रहा था । आइन्स्टीन काफी देर तक खडे रहकर उसका वह कौशल देखते रहे । फिर उन्होंने उससे कहा,”ईशवर की खातिर मुझे भी अपना बनाया हुआ बरतन देंगे क्या ?” उनके मुख से ईशवर का नाम सुनकर वह कुम्हार चौंका । फिर उसके होठों पर एक हलकी सी मुस्कान उभरी । उसने अपने हाथ में लिया हुआ काम छोड दिया और अपने बनाए हुए बरतनों में से एक सबसे सुंदर बरतन उठाया । उसे साफ करके बडे ही सुंदर ढंग से उसने आइन्स्टीन के हाथों में थमाया । कुम्हार का दिया बरतन अपने हाथों में लेने के बाद उन महान वैज्ञानिक ने उसे देने के लिए पैसे निकाले, परंतु उस कुम्हार ने उन पैसों को लेने से इनकार करते हुए कहा,”महोदय । आपने तो ईशवर की खातिर बरतन देने को कहा था, पैसों की खातिर नहीं ।” आइन्स्टीन अपनी मित्रमंडली में हमेशा इस घटना का जिक्र करते हुए कहते थे,”जो मैं कभी किसी विशवविद्दालय में नहीं सीख सका, वह मुझे उस कुम्हार ने सिखा दिया । मैंने उससे निष्काम ईशवरभक्ति सीखी ।”  भला जीवन से बडा विशविद्दालय है और कहां ।

देवी-देवताओं के नाम पर प्रचलित अन्धविशवासों में प्रमुख हैं – पशुबलि । इस जंजाल में अनेकों फंसते देखे जा सकते हैं । रजा कुमारपाल प्रजाप्रिय राजा थे । उनके गुरू हेमचन्द्राचार्य सदा उच्च कोटि के परामर्श दिया करते थे । उस राज्य में विजयदशमी के दिन देवी पर पशुबलि बडे धूम-धाम से मनाई जाती थी । उस दिन सैंकडों पशु काटे जाने थे । गुरू ने राजा को इस कुप्रथा को बन्द करने के लिए कहा । राजा ने कहा,”प्रजा इसके लिए तैयार न होगी । उसे मैं कैसे रूष्ट करूं ।” गुरू ने प्रजा को समझाने का काम अपने ऊपर ले लिया । सजधज कर बलि के निमित्त प्रजाजन पशुओं को लाए । गुरूदेव ने उन सबको एकत्रित करके पूछा,”देवी तो सबकी माता है । पशुओं की बलि लेकर तो वह रूष्ट होगी ।” प्रजाजन ने एक स्वर से कहा,”देवी बलि चाहती है और बलि से प्रसन्न भी होती है । यदि ऐसा न होता, तो हम लोग इस प्रथा को क्यों चलाते ?” गुरुदेव ने कह,”आप लोगों के कथन की सच्चाई की वास्तविकता अभी परखे लेते हैं । देवी के मंदिर में सभी बलि चढने वाले पशु बन्द कर दिए गए । सवेरा होते ही दरवाजा खोला गया और देखा गया कि कितने पशु देवी ने भक्षण किए हैं । दरवाजा खुलने पर सभी पशु गिने गए । एक भी कम न हुआ । गुरुदेव ने उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा.”देखा आप लोगों ने । देवी ने एक भी पशु नहीं खाया । उन्हें प्यारा पुत्र समझकर छोड दिया । फिर आप लोग ही प्राणि-हत्या क्यों ओढते हैं ?” गुरूजी की उक्ति से सभी प्रजाजन सन्तुष्ट हुए । पशुबलि रूक गई और प्रजाजन भी रूष्ट न होने पाए ।

एक हष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ शरीर का स्वामी नवयुवक किसी काम से कचहरी में गया । पढने-लिखने में वह कोरा था । इसलिए उसे मुंशी के पास जाना पडा । मुंशी के पास जाकर वह बोला,”भई। मेरी अर्जी लिख दो, जरा जल्दी है ।” अर्जी लिखने के लिए और भी लोग खडे थे । सो मुंशी ने कहा,” लाइन से लग जाओ, नंबर आने पर अर्जी लिख देंगे ।” दोपहर बाद दो बजे कहीं उसका नंबर आया । इतनी देर में वह खडा-खडा थककर चूर हो गया । रह-रहकर उसे यह अनुभव हो रहा था कि शारीरिक दृष्टि से समर्थ और बलवान होते हुए भी वह बौद्धिक दृष्टि से परावलंबी ही है । उस दिन से उसने स्वास्थ्य-साधना के साथ-साथ ज्ञान-साधना पर भी ध्यान देना आरंभ किया । दिन-रात एक करके उसने अपनी बौद्धिक क्षमता बढायी । उसी का परिणाम था कि वह बिहार प्रांत का स्वायत्त मंत्री बना । उन्हें आज भी लोग गणेश दत्त सिंह के नाम से जानते हैं ।

स्व. श्री चिमनलाल सीतलवाड उन दिनों बंबई विशवविद्दालय के कुलपति नियुक्त नहीं हुए थेम किसी और उच्च पद पर थे । एक मामले में बचने के लिए एक व्यक्ति उनके पास आय और एक लाख रूपये बतौर रिशवत देने लगा, किंतु सर सीतलवाड ने उसे अस्वीकार कर दिया । तब वह व्यक्ति बोला,”समझ लीजिए साहब ।आपको एक लाख रूपया देने वाला और कोई दूसरा नहीं मिलेगा ।” सर सीतलवाड हंसे और बोले,”भाई देने वाले तो बहुत मिलेंगे, पर इतनी बडी रकम मुफ्त में लेने से इनकार करने वाला कोई नहीं मिलेगा ।”

भक्त भगवान के मंदिर में जाकर नित्यप्रति मुक्ति के लिए प्रार्थना करता । भगवान नित्य की प्रार्थना सुनकर एक दिन प्रकट हो गए । भक्त से बोले,” आज ही मुक्ति प्राप्त कर ले ।” भक्त घबरा गया, आज ही इसी क्षण । वह ऐसा सोच भी न सकता था । घबराकर बोला,”दीनबंधु ठीक है । मुझे एक माह की मोहलत दे दें । बच्चे की शादी कर लूं और उसे घर का भार सौंप दूं । ।” भगवाब वायदे के अनुसार पुनः प्रकट हुए । बोले,” भक्त शादी हो गई । अब भार सौंपो और मुक्त हो जाओ ।” भक्त ने सोचा कि यह बुरे फंसे । बोला,” नाती का मुंह और देख लूं । एक साल की और माफी दे दें ।” भगवान फिर वायदे के अनुसार प्रकट हुए । भक्त घबडाया और गिडगिडाकर बोला,”प्रभु क्षमा करें । आप बार-बार आने का कष्ट न करें, मैं स्वंय आपके पास उपस्थित हो जाऊंगा ।” भगवान चले गए । भक्त की समझ में अपनी भूल आ गई कि बिना आसक्ति और मोह की निवृति के मुक्ति मांगकर उसने गलती की । भगवान तो चाहते हैं कि मुक्त हों-श्रेयपथ पर आरूढ हों । किंतु जब तक मोह और लोभ, आसक्ति और कामनाएं जकडे रहती हैं, इनसे छुटकारा पाए बिना मोक्ष-जीवन्मुक्ति असंभव है ।

श्री महेंद्रनाथ गुप्त (१९५४-१९३२) ने ‘श्री रामकृष्ण वचनामृत’ ग्रंथ में स्व्यं को श्री ‘म’ मास्टर, मणि, मोहिनीमोहन या एक भक्त आदि गद्द नामों से गुप्त रखने का प्रयास किया था, परंतु उनकी कीर्ति की अनुपम सुगंध स्वतः सर्वत्र फैल गई है । १८८२ में श्री रामकृष्ण के उन्होंने प्रथम दर्शन किए । उस समय वे मेट्रो विद्दालय की श्यामाबाजार शाखा (कलकत्ता) के प्राचार्य थे । उन्ही के शिष्य, उसी विद्दालय के छात्र श्री रामकृष्ण की भक्तमंडली में थे । इसी कारण उन्हें ‘मास्टर महाश्य’ नाम दिया जाता रहा है । वे लडके भगाने वाले मास्टर भी कहलाते थे । महेंद्रनाथ ठाकुर के पास जाते, चुपचाप सब सुनते, देखते और सारी घटनाओं तथा परिवेश को अपने स्मृतिपटल पर अंकित करके लोटते । बाद में अपनी आदत के अनुसार दैनंदिनी में सभी कुछ संक्षिप्त लिपिबद्ध कर लेते । बाद में यही ‘श्री रामकृष्ण वचनामृत’ के रूप में प्रकाशित हुआ, जो बंगला के पांच खंड, हिंदी के तीन खंडों के रूप में घर-घर में प्रच्लित हुआ ।

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1 Comment

  1. अति सुन्दर
    यहा तो वाकइ ज्ञान के दीप जले .

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