श्री महार्षि प्रवचन
Posted in Uncategorized on 03/15/2009 07:57 pm by Anjana Dattaऐ जीव ऐसा प्रतीत होता कि तू डरता है शायद तू मुझे अपने साथ नहीं देखता । केवल यही कारण तेरे भय का है । मैं तुझे विशवास दिलातां हूं कि मैं तेरे साथ हूं । तू यह जान और भय से मुक्त हो जा । तू घबराता है, शायद इस लिऐ कि तुझे पता नहीं कि तेरे जीवन का रक्षक तेरे साथ है । जिसने तुझको सूर्य, चन्द्र्मा, जल, वायु तेरे बिना मांगे तेरी रक्षा के लिए दिये हैं, वह रोटी भी देता रहेगा । उसके पास सब कुछ है और हमेशा रहेगा । तू सन्देह मत कर । तू उसके भरे खजानों को देख कर अपने लिये न मिलने का सन्देह मत कर । मैं तुझको विशवास दिलाता हं कि मैं तेरा परम हितैषी हूं, तेरा सच्चा मित्र हूं और तेरे दुःख का साथी हूं । क्या मेरा प्रेम तुझे मुझसे प्रेम करने को मजबूर नहीं करता ? क्या मेरी दया तेरे दिल में मेरे लिये वफादारी पैदा नहीं करती ? तू मेरे प्रेम को देख कर मुझसे प्रेम कर और मेरी दया को देख कर मेरा बन जा । ऐसे न चल कि मुझे तुझको जबरदस्ती वापस लाना पडे । तुझे उसमें कष्ट होगा और मैं भी इस दुःख से पीडित हूंगा । तू देख कि मैं कितना सुन्दर हूं । सब कुछ मेरे पास है, इसलिये तू मुझी को प्रेम करना सीख । मैं अन्नत काल तक तेरे साथ रहूंगा और तुझको हर एक खुशी देता रहूंगा । मैं हर सौन्दर्य का और हर आनन्द का आनन्द हूं । मुझसे भिन्न पदार्थ पहिले मेरा बनने पर तुझको खुशी दे सकेंगे वर्ना नहीं । तू संसार के लिये मुझको मत छोङ । वह पहले ही तेरे लिये बनाया गया है । वह समयानुसार तुझको मिलता रहेगा । तू मेरी याद कर । मैं तुझको सब कुछ दे दूगां । मैंने संसार और तुझको एक जरा से इशारे (छोटे से संकल्प) से पैदा कर दिया । मुझें इसमे कोई कष्ट न हुआ । अब क्या तुझको जीवन रक्षा के समान देते हुए मुझे कष्ट होगा ? जब मैं तेरी इच्छा के विरुद चलता हूं, तू मुझ पर नाराज होता है और क्या तू कभी अपने मन से भी लडा जो नित्य मेरी इच्छा के विरुद चलता है । संसार तुझको अपना स्वार्थ लेकर प्रेम करेगा और मैं तुझको तेरे ही स्वार्थ की पूर्ति के लिये बुलाता हूं । मेरा मन तुझे कुछ देने को चाहता है । तू मेरे सामने खाली हो कर आ ताकि तुझे भर दिया जाये । तू सब बातों का ध्यान छोड कर केवल मेरा ध्यान कर और यह तेरा धर्म है । जो कुछ मुझे तेरे लिये करना है वो मैं कर रहा हूं और करता रहूंगा जो कि मैंने तेरे लिए बना रखा है । लेकिन अगर तू किसी असमर्थता के कारण उस अपने धर्म को पूरा न करेगा जो मेरे लिये है तो मैं तो अपने उस कर्त्तव्य को पूरा करता ही रहूंगा जो कि मैंने तेरे लिये बना रखा है । मैंने उस समय भी तेरी चिन्ता की जब तू अपनी चिन्ता के योग्य न था, बहुत छोटा था । मेरे लिये अब भी तू वैसा ही है । विशवास कर, मैं तेरी चिन्ताऔं को दूर करता ही रहुंगा । जिस प्रकार मैं तुझसे कल का पूजन, कल का सिमरन, ध्यान और याद आज नहीं मांगता, उसी प्रकार तू भी मुझसे कल की आवशयकताऔं की पूर्ति आज मत चाह । मेरी इच्छा है तूझको नित्य का सामान दे दूं या आज का आज, कल का कल । जब मैं कुछ नहीं देता, उसमें भी कुछ दिया ही करता हूं । मेरे लिये कांटे पुष्प से अधिक सौन्दर्य रखते हैं । जो देता हूं, चुपके से लिये जा । मैं तुझसे अधिक तेरी भलाई को जानता हूं और तुझको बडा बनाना चाहता हूं । मैंने जो कुछ तुझको दिया है, तू उसमें सन्तुष्ट हो जा, इसका विरोध न कर, तुझे कष्ट होगा और तू अपनी शक्ति से उसको बदल न सकेगा । इस प्रकार धन्यवाद में भी कमी होगी । तू मेरी इच्छा से सन्तुष्ट रह । तेरे तन और मन को शांति मिलेगी और तेरी दौलत बढेगी । तू जब मेरा ध्यान करे, मेरी महानता को अच्छी प्रकार समझ । उसको यहां तक देख कि अपने को या तो तुच्छ बना ले या बिल्कुल न होने के ब्रराबर समझ । मेरे महान प्रकाश, तेज और बल का ध्यान कर और मुझको अपने साथ समझ कर भय से मुक्त हो जा । तू मेरे सामने बैठकर छोटा न रहेगा । मेरी दया तुझको मेरे साथ मिलाती रहेगी । मैं तुझको विशवास दिलाता हूं अगर तू अपनी इच्छा से मेरी इच्छा को बडा मान ले और मेरी आज्ञाओं को जब्र करके भी मनवाये तो तेरा हॄदय पवित्र हो जायेगा, तुझको बेपरवाही मिल जायेगी । तेरे मन से इच्छाऐं और उनकी पूर्ति का कष्ट जाता रहेगा । मैं इस संसार को आज्ञा दे दूंगा कि वह हर बात का ध्यान रखे, तेरी हर मुशकिल में काम आये और अगर तुझ पर कोई ऐसी कठिनाई आ जाये कि जिसको संसार भी दूर न कर सके तो मैं सर्वशक्तिमान महान तेज वाला स्वंय आकर तेरे उस कष्ट को दूर कर दूंगा । यह सच है और बिल्कुल सच है । इस प्रकार हर चिन्ता से मुक्त हो जायेगा । हर आराम तुझको मिल जायेगा, संसार मेरा है, मैं तुझको दे दूंगा और तेरे हर लोक और परलोक की जरुरतों को मैं पूरी करता रहूगा । चिन्ता मत कर ।
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति । ।