वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
Posted in Uncategorized on 04/17/2009 01:16 pm by Anjana Datta भारतीय जनता दल के चुनाव घोषणा-पत्र में बाकी बातों के इलावा साधु-सतों से आशीर्वाद लेने की बात भी कही गई है जो सराहनीय है । ऐसा कर भारतीय जनता दल ने देश की संस्कृति और धर्म में आस्था व्यक्त कर पुरातन भारतीय ऋषि-परंपरा के गौरव को उजागर करने का संकेत किया है । यह सत्य है कि ऋषि-परंपरा सदैव से भारत का गौरव रही है । वास्तव मे भारत सदा से ऋषि-मुनीयों का देश रहा है और उनका उचित आदर-सम्मान करना प्राचीनकाल से भारतीय परंपरा रही है । हर युग में, हर काल में इसका उल्लेख मिलता है जिससे पता चलता है कि ऋषि-मुनी सदैव से राजकीय श्रद्धा और सम्मान के पात्र रहे हैं । उन्हें राजाओं और प्रजा से हमेशा उचित सम्मान मिलता रहा है । चाहे उनके पास किसी प्रकार की सत्ता नहीं होती थी कितुं उनके प्रति राजाओं और महाराजाओं की श्रद्धा अपार हुआ करती थी । रामायण में इस बात का वर्णन आता है जब राजा जनक और राजा दशरथ ऋषि वशिष्ठ से परामर्श लेकर ही अपने राज्य में कोई महत्वपूर्ण कार्य किया करते थे क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि उनके मार्ग-दर्शन में काम करने पर ही देश का हित निर्भर करता था । यह श्रद्धा उन्हें यूं ही नहीं मिलती थी । वे कठोर तप, ज्ञान, उत्सर्ग और निष्ठा के कारण ही लोक-श्रद्धा का अर्जन करते थे और उसी आधार पर वे समाज और राष्ट्र को उपयुक्त दिशा-निर्देश देते थे जो सदैव देश, समाज और राष्ट्र के हित में होते थे, जिसका पूर्णतया पालन करना राजा तथा प्रजा दोनों ही अपना धर्म एवं कर्त्तव्य समझते थे । इसमें उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता था । लोक-सेवा तथा देश-सेवा से ओत-प्रोत लोक-मंगल ही इनका मुख्य उददेश्य होता था । इनके साथ ही एक विशेष वर्ग भी होता था जो ‘पुरोहित’ कहलाता था । उसका कार्यक्षेत्र भी लोक-शिक्षण का व्यापक स्तर पर संपन करा समाज में सांस्कृतिक संवेदना का संचार कर राष्ट्र और समाज को जाग्रत रखना था ।
यह भी ऋषि-मुनी, तपस्वी, योगी और मनीषी स्तर की योग्यता तथा पात्रता संपादन करके सेवाधर्म अपनाकर जन समुदाय का मार्गदर्शन करते थे । आदर्शों से ओत-प्रोत अपने निजी जीवन का पारिवारिक और वैयक्तिक स्वरूप इस कदर जनसाधारण के सामने प्रस्तुत करते थे जोकि आम लोगों के लिए एक उदाहरण बन सके कि सीधे- सरल तरीके से किस प्रकार सर्वोपयोगी उत्कृष्ट जीवन जिया जा सकता था॥ वे अपने आदर्शों से लोगों के चिंतन में ऐसी उत्कृष्टता भर देते थे जिससे उनके संपर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था । यह सच है कि जब भी कभी राष्ट्र की आत्मा मूर्छित होने लगी तो पुरोहितों ने ही उसे चेतन किया । प्राचीनकाल में जितने भी बडे-बडे यज्ञ सम्पन हुए हैं जैसे अशवमेध, नरमेध, राजसुय, बाजपेय, पावस आदि, ये सभी साधु-ब्राह्मण सृजन व संस्कारवान आत्माओं यानि कि पुरोहितों द्वारा ही संपन हुए हैं ।
एक तरह से सारा सामाजिक ढांचा ऋषि-मुनीयों के कधों पर ही टिका हुआ था । वे मानवता के लिए जीते थे और अपना सारा तप, ज्ञान और बल कठोर तपशचर्य से अर्जित करके लोक-कल्याण हेतु ही लगा देते थे । उनका अपना सारा जीवन त्यागमय होता था । संग्रह को वे पाप समझते थे । केवल उतनी ही चीजें अपने पास रखते थे जितनी तात्कालिक आवश्यकता के लिए बहुत जरूरी होती थी । तभी तो पीपल के वृक्ष के छोटे फलों को खाकर अपना गुजारा करने वाले ऋषि का नाम पिप्प्लाद पडा । खेतों में गिरे हुए दाने-कण-कण को बीनकर काम चलाने वाले महर्षि ‘कणाद’ कहलाए । महर्षि चाणक्य जो एक बहुत बडे साम्राज्य के महामंत्री होकर भी अपनी एक साधारण सी कुटिया में निवास करते थे । उनके ब्राह्मणोचित सादगीपूर्ण एवं त्यागमय-जीवन अपने आप में एक मिसाल हुआ करता था । वे राजा अतः प्रजा दोनों को उन सामाजिक मूल्यों और कर्त्तव्यों के प्रति सदैव जागृत रखते थे जिनके आधार पर समस्त सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था टिकी हुई थी । इसीलिए वे सम्मान तथा श्रद्धा के पात्र बनते थे । उनकी इसी देन के कारण ही भारतवर्ष कभी जगदगुरू कहलाता था और भारतभूमी देवभूमी । वह समय चक्रवर्ती आर्य साम्राज्य का दौर था और वैदिक संस्कृति की ध्वजा चारों ओर फहराती थी । वह भारत के इतिहास का स्वर्णमय युग था । लोगों के घरों पर सोने के कलश रखे रहते थे । तभी तो भारत सोने की चिडिया कहलाता था । यह सब ऋषि-मुनीयों के तप-त्याग का ही फल था जो भारत के यश की ध्वजा चारों तरफ फैली हुई थी और उसका फल सारा राष्ट्र भोगता था ।
परंतु आज यह सब विस्मृतप्राय हो गया है । धीरे-धीरे राजसत्ता का वर्चस्व बढता गया और धर्म-पुरोहितों का घटता गया । अब समय ऐसा आ गया है कि धर्म के नाम पर समाज में वैमनस्य का विष फैलाने की राजनीति चल पडी है जिसने न केवल भारत में ही अपितु सारे विशव में तबाही मचाई हुई है । भरतीय उपमहादीप में यह एक हिंदू-मुस्लिम समस्या के रूप में है, तो यूरोप में यहूदी-ईसाई, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट, बौद्ध्-ताओ उन्मादों के रूप में नजर आती है । राजनीति भी आज एक घटिया स्तर की राजनीति होकर रह गई है जिसमें स्वार्थी, लोभी और भ्रष्ट लोगों का बोलबाला अधिक है जिनके लिए शासन-सत्ता सेवा के लिए नहीं बल्कि सुख भोगने के लिए है । राजनीति जो कभी लोकसेवा तथा देश-सेवा जैसे नैतिक आदर्शों के उददेश्य से उच्चस्तरीय नेतागणों द्वारा अपनायी जाती थी, वही आज एक छल-प्रपंच, भ्रष्टाचार, सत्ता लोलुपता एवं स्वार्थी लोगों का एक मात्र साधन बन कर रह गयी है । कुछेक को छोडकर अधिकांश नेताओं के दामन भ्रष्टाचार, अपराध एवं अनाचार से सने हुए हैं । यों तो कहने को खददरधारी सफेदपोश नेता कहलाते हैं लेकिन वास्तव में हैं एक नबंर के भ्रष्ट, अपराधी एवं स्वार्थी जिनके लिए स्वंय अपने संकीर्ण दायरे से निकल पाना नामुमकिन है, भला वे लोगों का किस कदर आम जनता का मार्गदर्शन कर पाएंगे ? इनका सिर्फ एक ही मकसद है – हर कीमत पर सत्ता हथियाना ।
आज समूचा राष्ट्र भ्रष्टाचार एवं घोटालों के दलदल में फंसा हुआ है । इसका कारण है देश के नेताओं की सत्ता तथा धन की लोलुपता, देश और समाज के प्रति निष्ठा का न होना, आदर्शों और सिद्धांतों का न होना, उनका प्रमादी और निकम्मापन । ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ की उक्ति को ठीक ठहराते हुए आम जनता भी इसी राह पर चल रही है । इसी का परिणाम है कि इन दिनों समाज में लूट-पाट, धोखाधडी, ठगी और कई तरह के अपराधजनक मामले सरेआम हो रहे हैं जोकि चिंता का विषय है । सच तो यह है कि जिस गति से समाज में अनैतिक मूल्य गिरे हैं, उसी दर से आपराधिक वृत्तियां भी बढी हैं । ऐसे में कोई भी विवेकवान व्यक्ति चुपचाप बैठकर आंखें मूंदकर नहीं बैठ सकते । जरूरत है समाज में मानवीय मूल्यों की फिर से स्थापना करने की । मानवीय जीवन को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की जो आध्यात्मिक उपचार के बिना संभव नहीं है । उस आध्यात्मिक उपचार का नाम संस्कार है । समय की मांग है ऋषि-परंपरा को फिर से स्थापित करना । यह काम धर्माचार्यों का है जो लोगों की गिरती हुई मनोप्रवृत्तियों पर धर्म का अंकुश लगा सकें । एक बार साम्यवादी विचारधारा के एक पाश्चात्य विद्वान महात्मा गांधी के पास जाकर बोले,”महात्मा जी । जब संसार में इतना छल-कपट, अशांति और खून खराबा चल रहा है, तब भी आप धर्म की बात करते हैं । बुराइयां और रक्तपात जितनी तेजी से बढ रहे हैं, उसे देखते हुए धर्म निहायत बेकार चीज है ।” बापू ने कहा,”महोदय । जरा सोचिए तो सही कि जब धर्म की मान्यता रहते हुए लोग इतनी अशांति फैलाए हुए हैं, तो उसके न रहने पर यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि तब संसार की क्या दशा होगी ?”
जनमानस को प्रभावित और नियंत्रित करने वाले दो ही व्यवस्थाएं है- राजतत्रं और धर्मतंत्र ।
राजतंत्र का प्रभाव तो देश का शासन चलाने तक ही सीमित है । पर जनमानस को परिष्कृत एवं सुव्यवस्थित करना धर्माचर्यों का काम है जो किसी समय में देश के पुरोहित हुआ करते थे । इस समय समाज में जो आंतक, अभाव तथा अज्ञान फैला हुआ है, उसे मिटाने में वही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं । समाज में फैली सभी प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों का कारण मानसिक विकृत्तियां ही हैं जिनका परिमार्जन करना ही होगा ।समाज को अपराध और अपराधियों से तब तक मुक्त नहीं किया जा सकता, जब तक उनका चेतनात्मक परिष्कार न किया जाए । जेल और कानुन तो एक प्रकार के नियंत्रक हैं, मुक्ति प्रदाता नहीं । अपराध से मुक्त और अहिंसक समाज की स्थापना अध्यात्मिक उपचार के बिना संभव नहीं । यही सोचकर वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ प॰ श्रीराम शर्मा आचार्य, जो युगऋषि और इस युग के महर्षि व्यास, भी कहलाते हैं, ने गायत्री परिवार की स्थापना की ।
प॰ श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में,”जिसने यह संसार बनाया है, उसने यह अंकुश भी हाथ में रखा है कि जब मर्यादा का उल्लंघन चरम सीमा तक पहूंच जाए और लोग विवेक खोकर अनाचार अपनाने पर ही उतारूं हो जाएं, तो उनकी खोज-खबर ली जाए, काबू में लाने के लिए कठोरता भी अपनायी जाए । उल्टी चाल चलने वाले को कडाई अपनाकर सीधा चलने के लिए बाधित किया जाए । इन दिनों ऐसा ही हो रहा है । प्रसतुत विपत्तियों को देखते हुए लोगों को यह समझने के लिए बाधित किया जा रहा है कि सही रीति का परित्याग करने पर उन्हें कितनी विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड सकता है ।”
उनके अनुसार, युगपरिवर्तन की इस बेला में हममें से प्रत्येक का कुछ कर्त्तव्य है और उस कर्त्तव्य की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए । धर्म और अधर्म के महायुद्ध को दर्शक बनकर देखते नहीं रहा जाना चाहिए । अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ तो करें । यदि आज की विषम परिस्थितियों में भी हम बिगाड को रोकने के लिए कुछ नहीं करते, तो अगामी पीढियां हमारी इस निष्क्रियता को कभी क्षमा नहीं करेंगी । इस महाभारत के मध्य में खडा हुआ अब कोई अर्जुन कमजोरी की बात नहीं कर सकेगा । उसे गांडीव उठाना ही होगा और अधर्म के संहार और धर्म की स्थापना के लिए जुझना ही होगा ।”
वे नहीं चाहते थे कि गायत्री परिवार स्वार्थी, कायर एवं संकीर्ण लोगों में अपनी गणना कराए। उनका कहना था,”गायत्री परिवार के सामने एक उद्देश्ये वं लक्ष्य है, वह है- बुराइयों के उन्मूलन एवं अच्छाइयों के अभिवर्द्धन का सत्यप्रयत्न । हम में से प्रत्येक को इस समुद्रमंथन के समय देवपक्ष को सबल बनाने के लिए भागीदार होना पडेगा ।”
धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए ही उन्होने गायत्री परिवार की स्थापना की । सन १९५८ के सह्स्त्र कुंडी गायत्री महायज्ञ में उनका संकल्प उभरा और वैदिक मंत्र को उदधृत करते हुए उन्होने युग एवं राष्ट्र को आश्वस्त करते हुए कहा – ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ अर्थात हम पुरोहित राष्ट् को जीवत और जागृत बनाए रखेंगे । इसके लिए उन्होने सविता देवता को अपना पहला पुरोहित मानकर गायत्री तपोभूमी मथुरा, प्राचीनकाल में महर्षि दुर्वासा की रही तपस्थली तथा हरिद्वार में शांतिकुंज जो कभी गायत्री मंत्र के द्रष्टा महर्षि विशवामित्र एवं सप्तऋषियों की तपस्थली रही है, को मुख्य केंद्रों के रूप में चुना जहां पर न केवल उन्होंने स्वंय घोर तप किया अपितु प्राण प्रत्यावर्तन, उर्जावान सत्रों का आरंभ कर विभिन्न स्तर के साधकों-परिव्राजकों के शिक्षण संस्कार का ऐसा उपक्रम शुरू किया जो पहले चौबीस, फिर दौ सौ चालीस, उसके बाद चौबीस सौ और अब तक साढे पांच हजार से भी अधिक देश-विदेश में स्थापित प्रज्ञा मंदिरों, प्रज्ञा संस्थानों, शक्तिपीठों द्वारा सफलतापूर्वक चल रहा है । इन तीर्थ-केंद्रों में उन जाग्रत जीवात्माओं का आह्वान कर उन्हें पौरोहित्य संबधी कर्म-कांड में प्रशिक्षण देने हेतु शिविर लगाए जाते हैं जो राष्ट्र और समाज को जाग्रत रखने में तत्पर हों । यह केंद्र हैं -श्रद्धा के तीर्थ-स्थल और वहां पर घड रहे पुरोहित हैं धर्म-क्षेत्र के वे प्रतिनिधि राष्ट्र और समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं । इस प्रकार पैंतालीस वर्ष पहले वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा दिया गया आशवासन अभी तक यथार्थ रूप में पूरा हो रहा है जो हमारे देश और सारे समाज के लिए गौरव की बात है । इस पुरातन संस्कृतिक परंपरा को कायम रखना, नमन करना और श्रद्धा देना हम सबका कर्त्तव्य है ।
यही समय की मांग है ।
लेखिकाः
अंजना दत्ता,
#३१२/जी.एच.१,
मनसा देवी कम्पलैक्स,
सैकटर ५, पंचकुला ।
पिनः १३४ १०९
मौबाईल नः ९३१७५०८४२८
07/18/2009 at 12:24 am
इस पुरातन संस्कृतिक परंपरा को कायम रखना, नमन करना और श्रद्धा देना हम सबका कर्त्तव्य है ।
यही समय की मांग है ।