दृष्टिकोण बदलो

अपनी कठिनाइयां हमें पर्वत के समान दुर्भेद्द, सिंह के समान भंयकर और अंधकार के समान डरावनी प्रतीत होती हैं, परतुं यह सब यर्थाथ में कुछ नहीं, केवल भ्रम की भावना मात्र है, इनसे डरने का कोई कारण नहीं । इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार-बार असफल होना पडता है । परवाह मत करो, क्योंकि समय अनंत है । निरंतर कर्त्तव्य करते रहो, तुम्हारा एक-एक पग सफलता कॉ ओर बढ रहा है, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे, क्योंकि कर्त्तव्य का निशचित परिणाम सफलता है । सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिडगिडाओ, क्योंकि यथार्थ में किसी में भी इतनी शक्ति नहीं है, जो तुम्हारी सहायता कर सके । किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषारोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी दूसरा तुम्हें दुःख नहीं पहुंचा सकता । तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और तुम स्वंय ही अपने शत्रु हो । जो कुछ भली-बुरी स्थितियां सामने हैं, वह तुम्हरी पैदा की हुई हैं । अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जाएंगे । जन्म-जन्मान्तरों के सुसंस्कार जब एकत्रित हो जाते है, तभी मनुष्य ईशवर की प्राप्ति के लिए व्यग्र भाव से प्रयत्न करना आरंभ करता है । ५१ अखण्ड ज्योति-मार्च १९४१, मुख पृष्ठ

हृदय-मंदिर के अंदर संतोष

जब कभी किसी दुःखद घटना से तुम्हारा मन खिन्न हो रहा हो, निराशा के बादल चारों ओर से छाए हुए हों, असफलता के कारण चित्त दुःखी बना हुआ हो, भविष्य की भयानक आशंका सामने खडी हुई हो, बुद्धि किंकर्त्तव्यमूढ हो रही हो, तो इधर-उधर मत भटको । उस लोमडी को देखो, वह शिकारी कुत्तों से घिरने पर भाग कर अपनी गुफा मे घुस जाती है और वहां संतोष की सांस लेती है । ऐसे विषम अवसरों पर सब ओर से अपने चित्त को हटा लो और अपने हृदय-मंदिर में चले जाओ । बाहर की समस्त बातों को बिलकुल भूल जाओ । पाप-तापों को द्वार पर छोड कर जब भीतर जाने लगोगे तो मालूम पडेगा कि एक बडा भारी बोझ, जिसके भार से गरदन टूटी जा रही थी, उतर गया और तुम बहुत ही हलके, रूई के टुकडे की तरह हलके हो गए हो । हृदय-मंदिर में इतनी शांति मिलेगी, जितनी ग्रीष्म से तपे हुए व्यक्ति को बर्फ से भरे हुए कमरे में मिलती है । कुछ ही देर में आनंद की झपकियां लेने लगोगे ।  हृदय के इस सात्विक स्थान को ब्रह्मालोक या गोलोक भी कहते हैं क्योंकि इसमें पवित्रता, प्रकाश और शांति का ही निवास है । परमात्मा ने हमें स्वर्ग-सोपान सुख प्राप्त करने के लिए दिया है, किंतु अज्ञानतावश मनुष्य उसे जान नहीं पाते । ५२ अखण्ड ज्योति-मार्च १९४१, पृष्ठ ५

अंतर्मुखी होने पर ही शांति

अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर डालना चाहिए, अध्यात्म-पथ का अवलंबन लेना चाहिए । जगत में इधर-उधर भटकने वाला प्राणी इसी शीतल वृक्ष के नीचे शांति प्राप्त कर सकता है । जब बाहर की माया रूपी वस्तुओं के भ्रम से विमुख होकर हम अंतर्मुखी होते है, आत्मचिंतन करते हैं, तो प्रतीत होता है कि हम अपने स्थान से बहुत दूर भटक गए थे । आवश्यकताएं कभी पूर्ण नहीं हो सकती हैं, उन्हें जितना ही तृप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा, उतना ही वे अग्नि में घृत डालने की तरह और अधिक बढती जांएगी । इसलिए इस छाया के पीछे दौडने की अपेक्षा उसकी ओर से पीठ फेरनी चाहिए और सोचना चाहिए कि हम कौडियों के लिए क्यों मारे-मारे फिर रहे हैं, जब कि हमारे अपने घर में भंडार भरा हुआ है । अंतर में मुंह देखने पर, परमात्मा के निकट उपस्थित होने पर, वह ताली मिल जाती है, जिससे सुख और शांति के अक्षय भंडार का दरवाजा खुलता है । अपनी वास्तविक स्थिति को जानने से, आत्मस्वरूप को पहचानने से, संसार के स्वरूप का सच्चा ज्ञान होने से, शांति की शीतल धारा प्रवाहित होती है, जिसके तट पर असंतोष की ज्वाला जलती हुई नहीं रह सकती । तब वह मृगतृष्णा को त्याग देता है । सच्चा संतोष उप्लब्ध होने पर उसकी बाह्म आवश्यकताएं बहुत ही थोडी रह जाती हैं और जब थोडा चाहने वाले को बहुत मिलता है, तो उसे बडा आनंद प्राप्त होता है । ५३ अखण्ड ज्योति-मार्च १९४१, पृष्ठ १७

अपनी कठिनाइयां हमें पर्वत के समान दुर्भेद्द, सिंह के समान भयंकर और अंधकार के समान डरावनी प्रतीत होती हैं, परतुं यह सब यथार्थ में कुछ नहीं, केवल भ्रम की भावना मात्र है, इनसे डरने का कोई कारण नहीं । इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार-बार असफल होना पडता है॑ परवाह मत करो, क्योंकि समय अनंत है । बार-बार प्रयत्न करो और आगे की ओर कदम बढाओ । निरंतर कर्त्तव्य करते रहो, तुम्हारा एक-एक पग सफलता की ओर बढ रहा है, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे, क्योंकि कर्त्तव्य का निशिचत परिणाम सफलता है । सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिडगिडाओ, क्योंकि यथार्थ में किसी में भी इतनी शक्ति नहीं है, जो तुम्हारी सहायता कर सके । किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषारोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी दूसरा तुम्हें दुःख नहीं पहुंचा सकता । तुम स्वंय ही अपने मित्र हो और तुम स्वयं ही अपने शत्रु हो । जो कुछ भली-बुरी स्थितियां सामने हैं, वह तुम्हारी पैदा की हुई हैं । अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जाएंगे । जन्म-जन्मान्तरों के सुसंस्कार जब एकत्रित हो जाते हैं, तभी मनुष्य ईशवर की प्राप्ति के लिए व्यग्र भाव से प्रयत्न करना आरंभ करता है। ५१ अखण्ड ज्योति-मार्च १९४१,मुख पृष्ठ

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