कुछ प्रेरणादायक रोचक प्रसंग

एक बादशाह का एक बहुत ही मुंहलगा नौकर था । वह दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता था । एक दिन उसे विचार आया कि वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता है, तब भी उसे केवल पांच रूपये ही मिलते हैं और मीर मुंशी जो कभी कुछ नहीं करता, पांच सौ रूपये वेतन पाता है । इस भेद का क्या कारण है ? उसने अपनी यह उलझन बादशाह को कह सुनाई । बादशाह ने हंसकर कह दिया – किसी दिन मौके पर बताऊंगा । एक दिन एक घोडों का काफिला उसकी सीमा से गुजरा । बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि जाकर मालूम कर यह काफिला कहां जा रहा है ?  नौकर गया और आकर बतालाया कि हुजूर वह काफिला सीमा के कंधार देश जा रहा है । अब बादशाह ने मीर मुंशी को भेजा । उसने आकर बतलाया कि यह काफिला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है । उसमें पाचं सौ घोडे और बीस ऊंट भी है । मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घोडे बेचने जा रहे हैं । खरीदना चाहें तो कम कीमत पर मिल सकते हैं । मैंने पचास ऐसे घोडों को छांट लिया है, जो नौजवान और बडी ही उत्तम नस्ल के हैं । बादशाह ने तुरंत ही पचास घोडॅ खरीद लिए, जिससे उसे कम दामों पर अच्छे घोडे मिल गे । काफिले के विषय में चिंता जारी रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण-ग्राहकता का बडा अनुकूल प्रभाव पडा । बादशाह ने नौकर से कहा -”देखा तुम्हें पांच रूपये क्यों मिलते हैं और मीर मुंशी को पांच सौ क्यों ? नौकर ने इस अंतर के रहस्य को समझा और सदा के लिए सावधान हो गया ।

गांधी जी के जीवन की एक घटना है ।   बात चंपारण जिले की है । गांधी जी उस क्षेत्र में असहयोग आंदोलन का वातावरण बनाने के लिए गांव-गांव घूम रहे थे । एक गांव में उन्होंने पशुबलि का   जुलूस निकलते देखा ।  देवी को बकरा चढाने एक समूह गाता-बजाता जा रहा था ।  गांधी जी ने दृश्य देखा, तो उन्होंने एकत्रित लोगों को वैसा न करने के लिए समझाय ।  न माने तो नया प्रस्ताव रखा ।  पशु के रक्त से मनुष्य का रक्त उत्तम ही होगा ।  तुम लोग अपने देवता पर मेरी बलि चढा दो ।  उन्होंने सिर निचे झुका लिया और वहां जा खडे हुए, जहां बकरा कटना था । सन्नाटा छा गया ।  ग्रामीण लौट गए ।  वस्तुस्थिति समझी गई और उस क्षेत्र से बलि प्रथा सदा के लिए बंद हो गई ।

नेमिकुमार जी प्रसिद्ध जैन मुनि हुए हैं, तब  युवा थे ।  विवाह हो रहा था ।  बंधु-बांधवों एवं अभ्यागतों से भरे-पूरे घर में महोत्सव की घोषणा की जा रही  थी ।  बारात निकाली जा रही थी । वहीं पर महाश्य जी अपनी जीवनसंगिनी राजुल की सुखद कल्पना में खोए हुए थे ।  एकाएक पशुओं की चीत्कार सुनकर स्वप्न भंग हुआ और सारथी से पूछा, खुशी के इस क्षण में यह आर्तनाद कैसा ?  सारथी ने बताया,”कुमार । विवाह में शामिल म्लेछ राजाओं के भोज के लिए पशुओं का वध होना है, सो हठात उन्हें बलपूर्वक लिए जाया जा रहा है ।”   कुमार ने यह सुनकर आहत अनुभव किया ।  रथ रूकवाया, उतरे और खुद पशुओं के पास जाकर उनके बंधन खोलने लगे । अपने हाथ का कंगन भी खोल डाला और वहां से निकल पडे । बारातीगण मूकद्रष्टा बने रहे ।  अब वे बाहर-भीतर की सारी गांठें खोलकर परम निग्रर्थं हो गए ।  भोग से योग की ओर उन्नमुख हो गए ।  सौभाग्याकांक्षिणी राजुल भी दुल्हन का श्रृंगार उतारकर  शवेत वस्त्र पहने मुनि नेमिकुमार का अनुसरण कर जीवन के चरम फल की प्राप्ति के लिए गिरनार पर्वत की ओर बढ चली । वध

एक बार एक कलाकार ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई । उसे देखने के लिए नगर के लिए नगर से सैंकडों धनी-मानी व्यक्ति भी पहुंचे ।  एक लडकी भी उस प्रदर्शनी को देखने आई । उसने देखा सब चित्रों के अंत में एक ऐसे मनुष्य का भी चित्र टंगा है, जिसके मुंह को बालों से ढंक दिया गया है और जिसके पैरों पर पंख लगे थे ।  चित्र के नीचे बडे अक्षरों में लिखा था ‘अवसर’ । चित्र कुछ भददा हा था इसलिए लोग उस पर उपेक्षित दृष्टि डालते और आगे बढ जाते । लडकी का ध्यान प्रारंभ से ही इस चित्र की ओर था ।  जब वह उसके पास पह्यंची तो चुपचाप  बैठ कलाकार से पूछ ही लिया -;”श्रॉमान जी यह चित्र किसका है ?  आपने इसका मूंह क्यों ढंक रखा है तथा उसके पैरों में पंखों का क्या रहस्य है ?” कलाकार ने जवाब दिया -,”यह बेटी ‘अवसर’ का चित्र है ।  चूंकि साधारण व्यक्ति इसे पहचान नहीं पाते ।  अतः मैंने इसका मुंह ढंक रखा है, ताकि इसे देखकर जिज्ञासा तो उठे । पैरों में पंख इसलिए कि यह अवसर जो आज चला गया, कल फिर आएगा नहीं ।  इसलिए इसे उडने से पहले ही थाम लो ।  इसका  सदुपयोग कर लो ।” लडकी ने मर्म को समझा और तत्क्षण ही अपने जीवननिर्माण में जुट गई । घटना सन १९४० की है ।  उन दिनों महात्मा गांधी के आश्रम सेवाग्राम में परचुरे शास्त्री नामक एक विद्वान भी रहते थे, जो कुष्ठ रोग से पीडित थे ।  बापू स्वंय उनका उपचार किया करते थे ।  वे उनकी मालिश किया करते, घावों को धोते और दवाई लगाते । एक दिन जब बापू शास्त्री जी की मालिश कर रहे थे, आश्रम के ही एक कार्यकर्त्ता पंडित सुंदरलाल भी वहीं  उपस्थित थे । उन्होंने गांधी जी से कहा -,”बापू । कोढ की तो एक अचूक औषधि है ।  कोई जीवित काला नाग पकडकर मंगवांए और कौरी मिट्टी की हांडी में बंद कर उसे उपलों की आग पर इतना तपाएं कि नाग जलकर भस्म हो जाए ।  उस भस्म को यदि शहद के साथ रोगी को खिलाया जाए तो कुष्ठ कुछ ही दिनों में दूर हो सकता है ।”  महात्मा गांधी इस उपाय के संबंध में कुछ कहें, इसके पहले ही शास्त्री जी ने कहा -,”बेचारे निर्दोष सांप ने क्या बिगाडा है ?  जो उसको जलाकर अपना रोग ठीक किया जाए ।  इससे तो मेर स्वयं का मरना ही ठीक है, क्योंकि हो सकता है पूर्व जन्म के किसी पाप के कारण मुझे यह रोग लगा हो ।”

देवमंदिर का पुजारी भगवान की पूजा तो पुरे विधि-विधान से करता, किंतु सुबह-शाम पूजा करने के बाद बचे समय में वह स्वार्थ के वशीभूत हो ऐसे कर्म करता, जिससे भगवान के बनाए अन्य प्राणी दुःख पाते ।  उसके अंतःकरण से एक दिन भगवान बोले-”अरे मूर्ख । सेवा कर, मेरी पूजा करने के बाद सेवा की इच्छा न हो तो पूजा व्यर्थ है ।”  पुजारी ने कहा -”भगवान मेरा मन तो आपकी पूजा में लगता है । लोगों की सेवा में नहीं ।  भीतर से आवाज आई – तू पगला है,  क्या मैं पत्थर की मुर्ति में ही हूं, इन जीते-जागते प्राणियों में तुझे मेरा रूप नहीं दिखता ? पुजारी को सच्चा ज्ञान हुआ कि सेवा ही पूजा की कसौटी है । यदि उपासना के पशचात भी लोकसेवा की भूख न जागे तो समझना चाहिए कि कहीं-न-कहीं भूल है ।  अपने आपको इस कसौटी पर कसने पर वह खरा न उतरा । उसने आगे से लोकसेवा क्प् नित्यकर्म में सम्मिलित कर लिया ।

जय-विजय भगवान विष्णु के द्वारपाल थे ।  उन्हें अपने इस अधिकार पर घमंड हो गया । उन्हें इसमें अपना अनादर प्रतीत हुआ कि कोई उनसे पूछे बिना ही बैकुंठाधिपति से मिलने चला जाए । इन द्वारपालों ने अपने अधिकार का दुरूपयोग कर नारायणप्रिय लक्ष्मी स्वंय गृहस्वामिनी को भी भीतर जाने से रोक दिया । लक्ष्मी जी शालीन स्वभाववश  मौन रह गई, पर जिस दिन उन्होंने सनक-सनंदन, सनातन और सनत्कुमार जैसे महात्माओं को रोक दिया, तब वे चुप न रहे ।  उन्होंने दोनों को असुर होने का श्राप दिया ।  तीन कल्पों में उन्हें हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, रावण-कुंभकरण एवं शिशुपाल-दुर्योधन के रूप में जन्म लेना पडा । संतों को तो उन्हें निरहंकारिता का पाठ पढाना था ।  बैकुंठावासी होने के नाते स्वंय मे पूर्णता मानकर अपने आपको पतन के भय से मुक्त मान लेना किसी के लिए भी पराभव का कारण बन सकता है  । निष्कर्ष यही है, जब स्वर्ग में बैठा एक उच्च पदाधिकारी भी इस दुर्बलता के कारण रावण आदि असुर योनि को प्राप्त होता है, तो फिर मृत्युलोक का प्राणी यह कैसे मान लेता है कि वह आत्मा की उपेक्षा कर प्रगति कर सकत है ?

स्वामी विवेकानंद एक सत्संग में भगवान के नाम की महिमा और् महत्ता बता रहे थे ।  एक तार्किक ने कहा -”शब्दों में क्या रखा है, इन्हें रटने से क्या लाभ ? स्वामी विवेकानंद ने उत्तर में उन्हें अपशब्द कहे ।  मूर्ख, जाहिल आदि कहा ।  इस पर वह तार्किक आगबबूला हो गया और भन्नाते हुए कहा -”आप सन्यासी के मुंह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते ।  उन्हें सुनकर मुझे बहुत चोट लगी है ।” स्वामी जी ने हंसते हुए कहा -”भई वे तो शब्द मात्र थे । शब्दों में क्या रखा है ।  मैंने कोई पत्थर तो नहीं मारा ?” सुनने वालों तक का समाधान हो गया ।  शब्द जब किसी को क्रोध उत्पन्न कर सकते हैं, तो जिसके लिए प्रिय शब्द भावपूर्वक कहे जाएंगे, उसका अनुग्रह वे क्यों न आकर्षित करेंगे ?

एक शिकारी तीर-कमान लेकर शिकार मारने निकला, पर कोई बडा जानवर हाथ न लगा ।  एक छोटा खरगोश भर पकड सका तो उसे घोडे पर लादकर वापस लौट पडा । लौटते समय वह अपने वतन का रास्ता भूल गया, सो उसने पेड के नीचे बैठकर चिडियां चुगा रहे लडके से पूछा,”क्या तुम मेरे गांव का रास्ता बता सकते हो ?” लडके ने कहा,”मैंने दो ही रास्ते सुने हैं, एक दोजख का, जो तुम्हारे जैसे बेरहम लोगों को बिना किसी से पुछे मिल जाता है । दूसरा मेरी तरह नेकी करने का, जो जन्नत की ओर जाता है । तुम्हें जिस पर जाना हो, बिना पूछे चले जाओ ।” शिकारी के मन में बात चुभ गई ।  उसने खरगोश को नजदीक की झाडी में स्वच्छंद घूमने-फिरने के लिए छोड दिया और फिर कभी शिकार न करने की कसम खाई ।

स्वामी श्रद्धानंद ने अपना घर बेचकर उस पैसे से हरिद्वार के पास कांगडी गांव में दस विद्दार्थियों को लेकर एक गुरूकुल चलाया ।  अध्यापक, पालक, संचालक वे स्वंय ही थे । जिस तत्परता से उनने बच्चों को पढाया तथा विद्दालय चलाया, उसने देखने वालों के मन जीत लिए।  ख्याति के साथ-साथ छात्रों की संख्या तथा उदारजनों की सहायता भी बढती गई ।  एक-एक करके गुरूकुल विकसित होता गया ।  स्वामी जी के जीवनकाल में ही वह संस्था उन्नति के चरम लक्ष्य तक पहुंच चुकी थी ।  आज उसे विशवविद्दालय का दरजा प्राप्त है ।

पिता ने स्वंय बालक का यज्ञोपवीत संस्कार कराया ।  विद्वान पिता के विवेकवान पुत्र ने पूछा पिता जी यह धागे गले में डालने का क्या मतलब है ।  पिता बोला – मनुष्य जीवन को विवेक से बांधकर रक्खा जाए ताकि मनुष्य  सांसारिक आकर्षणों में ही उलझ कर न रह जाए वरन अपना पारमार्थिक लक्ष्य भी पूरा करने के लिए सजग रहे । बालक के मन में पिता की दी गई शिक्षा ऐसी गहरी बैठी कि आगे चलकर यही बालक विशव-विख्यात जगदगुरू शंकराचार्य नाम से विख्यात हुआ ।

सर्वविदित है कि रामकृष्ण परमहंस काली के अनन्य उपासक थे । लोगों ने रानी से शिकायत कर दी कि जो भोग हैं वह स्वंय खा जाते हैं और जूठन फैला देते हैं ।  रानी रासमणि एक दिन  छत पर गयी और वह से छिप करके देखती रहीं सारा नजारा ।  सही बात यह हुई कि रामकृष्ण काली से कहने लगे -’मां आप भोजन कीजिए ।’ वह चुप रहीं, क्या कहतीं ।  रामकृष्ण ने कहा-’अच्छा पहले बेटा खालेगा तब मां खायेगी ।’  उन्होने ऐसा ही किया । आधा भोजन स्वंय कर लिया और जब काली से कहा-’माता अब आपको करना पडेगा ।’  तभी रानी रासमणि ने देखा कि पत्थर की मूर्ति के हाथ हिलने लगे और उन्होंने थाली में जो भोजन था वह  उठाया और निगल लिया ।  सारा भोजन वे खा गयीं  । खाली थाली धोने के लिए रामकृष्ण परमहंस बाहर निकल रहे थे, तब रानी रासमणि आयीं और उनके चरणों पर गिर पडीं ।  उन्होने कह-’देवे, आप साक्षात काली हैं ।’ यह बात सही है कि  रामकृष्ण परमहंस साक्षात काली थे, क्योंकि अपनी श्रद्धा से उन्होंने पत्थर की मुर्ति को साक्षात काली बना दिया था ।  रामकृष्ण ने जब विवेकानन्द से कहा कि काली के पास जा और नौकरी मांग ले तो विवेकानन्द ने वहां जाकर देखा कि विशालकाय काली जमीन से लेकर आकाश तक को छू रही थी ।  वह कहां से पैदा हुई थीं – उसी पत्थर में से पैदा करदी थी रामकृष्ण परमहंस ने ।  वह उनकी श्रद्धा से बनी थी ।  अब भी वही मुर्ति है वहां, पर अब उसमें कोई दम नहीं है ।  चोर एक बार उस मूर्ति की सोने की जीभ चुरा ले गये थे ।  तब वह पत्थर ही रह गयी थी ।  पत्थर को साक्षात कली बना देने का श्रेय  रामकृष्ण परमहंस को है ।

दैत्य हिरण्यकशिपु जन्मा तो भगवान ने नृसिहं अवतार लिया और्ु उसका विनाश कर वापस चले गए ।  अहंकारी बलि का दर्प चूर करने वामन रूप में अवतरित होना पडा ।   रावण के अत्याचारों से दुखी ऋषि-मुनियों के उद्धार के लिए राम रूप में आकर रावण से संग्राम करना पडा ।  और आततयी कंस, चाणूर और कौरव-पाण्डवों से जूझने और उन्हें  परास्त करने में  श्रीकृष्ण भगवान का जीवन बीत गया । कहते हैं कि इस सब मारा-मारी से दुखी होकर भगवान पीपल के वृक्ष के नीचे लेटे-लेटे चिन्तन कर रहे थे कि किसी  व्याध ने तीर का वार कर दिया ।  जिससे उन्हें प्राण छोडने के लिए बाध्य होना पडा ।उस समय उनके पास उनका सारथी खडा था ।  भगवान का अन्तिम समय देखकर सारथी ने पूछा,”प्रभो कोई अन्तिम संदेश या उपदेश हो तो कहते जाइए  ।  अब आप अगली बार किस रूप से प्रकट होंगे  ।”  भगवान बोले,”मैं बार-बार पृथ्वी पर आकर मनुष्य की सहायता करते-करते थक गया हूं ।  इस प्रकार की प्रत्यक्ष सहायता से मनुष्य में परावलम्बन ही बढा है  ।   आगे मेरा अवतार लेने का मन नहीं है ।”  सारथी बोला,”किन्तु देव॑ । हम  मनुष्यों का उद्धार कैसे होगा, कौन करेगा ?”  भगवान बोले,”मैंने  गीता में उपाय बता दिया है ।  ‘उद्धरेदात्मनात्मानम’ मनुष्यापना उद्धार करने में स्वंय समर्थ हैं ।  वह पुरूष हैं ।  पुरूषार्थ की सामर्थ्य उसे परमपिता परमात्मा से विरासत में मिली है । देवी-देवताओं के सामने गिडगिडाते उसे शोभा नहीं देता ।  सारथी बोला,”फिर भी प्रभो आपकी सहायता आवश्यक है ।”  भगवान् बोले,”ठीक है, अब आगे से पुरूषार्थ तो पुरूषार्थी पुरूष को ही करना पडेगा ।  मैं  मार्गदर्शन करने और संघबद्ध करने किसी न किसी रूप में आता रहूंगा ।”  तब से बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, समर्थ, रमकृष्ण परमहंस, ईसा, मूसा के रूप मे> अनेकों बार भगवान आते रहे हैं और्पना काम करके चले जाते हैं ।

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