कर्त्तव्य-पालन

जिन कार्यों को करने की हृदय स्वीकृति दे, वही मनुष्य का कर्त्तव्य अथवा धर्म है और हृदय जिन कार्यों को करने की सलाह न दे, उन्हें नहीं करना चाहिए क्योंकि वे अधर्म या अकर्त्तव्य हैं ।
जो मनुष्य अपने कर्त्तव्यों का यथोचित रीति से पालन करता है, उस सदाचारी मनुष्य को कभी कोई दुःख नहीं सहना पडता । क्योंकि वह ईशवर की इच्छानुसार कार्य करता है, इसलिए ईशवर सदैव उस पर दया दृष्टि रखते हैं । प्रायः ऊपर से देखने पर सदाचारी पुरूष निर्धन और दुःखी मालूम होते हैं, पर वास्तव में यह बात नहीं है । सदाचारी पुरूष में असाधारण दैवी शक्ति होती है । जिस पुरूष में वह दैवी शक्ति है, वह दुःखी कैसा । सदाचारी पुरूष निर्धन तो हो ही नहीं सकता ।
सच पूछा जाए तो सच्चा खजाना सदाचारी के ही पास है । उसका वह खजाना कभी खाली नहीं होता, उसे खर्च करने पर बढता ही जाता है । सदाचार के विचारों का चिंतन करने से ही आत्मा को अपार शातिं और शीतलता प्राप्त होती है । दुष्टों को सदा अपने दुशमनों का भय बना रहता है कि कहीं कोई हमारा अनिष्ट न कर दे, पर सदाचारी के पास ये सब बातें कहां ? वहां न कोई दोस्त है न दुशमन । उसके लिए तो सारा संसार एक – सा है ।
ईशवर चाहता है कि प्राणी इस जगत में अच्छे-अच्छे कार्य करे और अंत में परम मोक्ष को प्राप्त हो ।

५० अखण्ड ज्योति-फरवरी १९४१, पृष्ट २४

 दे, उन्हें नहीं क

 

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