आपको नेता चाहिए या स्त्रजेता
Posted in Uncategorized on 04/06/2009 04:52 pm by Anjana Dattaजिस तरह वर्षा ऋतु में मेंढकों की बाढ आ जाती है, ठीक उसी प्रकार से चुनाव के दिनों में नेताओं की । जिधर ईंट उठाओ, नेता हाथ लगता है । हर गली-कूंचे में, जिस तरफ भी नजर उठाकर देखो, वहीं नेता ही नेता नजर आते हैं जो अपना वोट बैकं बनाने के चक्कर में भोली-भाली जनता को रिझाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं । हर कोई एक दूसरे को नीचा दिखाने पर तुला हुआ है ।
गली, मुहल्ले, सडकों और चौराहों पर पान चबाते हुए, जोशीले भाषण करते हुए बरसाती मेढंकों की तरह टर्र-टर्र करते हुए आम लोगों की भावनाओं को उत्तेजित करके जाति, धर्म और पार्टी के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं । कई प्रकार के प्रलोभन दिए जा रहे हैं । प्रत्याशी चाहे किसी भी पार्टी से सबंधित हो, हथकंडे सभी ने यही अपनाए हुए हैं क्योंकि मकसद सभी का एक ही है – किसी न किसी तरह से सत्ता में आना । मतदाताओं को फुसलाना - चाहे व्यक्तिगत प्रलोभन देकर या फिर जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर उनको भडका कर उनका मत हासिल करना । इन दिनों धन का वर्चस्व अत्यधिक है । धन का प्रलोभन देकर गरीब और आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग से वोट खरीदें जा रहे हैं । यह हमारे लिए बहुत दुर्भाग्य की बात है कि आज नेता का चुनाव करने के लिए भी धन को सर्वप्रथम स्थान दिया जा रहा है । यही वजह है कि जिनके पास धन की तिजोरियां भरी पडी हैं, उनको पार्टी का टिकट मिलते देर नहीं लगती जबकि इतने कितने ही ईमानदार, योग्य और लोकसेवी मनुष्य चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते । ऐसे में मतदाता अपना कीमती वोट किसे दें ?
किसे अपना प्रतिनिधि चुनें ? कौन हो हमारे मत का असली हकदार ?
इसका निर्णय हर किसी मतदाता को स्वंय ही करना है ।
यह समय है व्यक्तिगत प्रलोभनों को त्यागकर, किसी बहकावे में न आकर देश के लिए योग्य, निष्ठावान और ईमानदार नेता को चुनने का ? क्या ऐसा संभव हो पाएगा ? क्या आम जनता
ऐसा कर पाती है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं ? क्या वजह है इसकी ?
इसमें कोई शक नहीं कि प्रजातंत्र का मूल आधार है – वोटर और उससे भी कीमती है उसका मतदान । वोटर स्वंय कितना समझदार, चुस्त और होशियार है और कितनी सुझबूझ एवं दूरसर्शिता से वह अपने मतदान का प्रयोग करता है - शासन का स्वरूप यहीं से निर्धारित होता है । आधार जैसा होगा, स्वरूप वैसा ही बनेगा । वोटर जिस स्तर के होंगे, प्रतिनिधि उसी स्तर के चुने जाएंगें ।
निर्वाचितों की मनोवृत्ति तथा चरित्रनिष्ठा पर ही शासन का स्वरूप निर्धारित होता है और उस स्वरूप के आधार पर ही वे परिस्थितियां
बनती हैं जो जनसाधरण, समाज तथा देश को प्रभावित करती हैं । वोटरों में यदि
वोट के स्वरूप, उत्तरदायित्व और परिणाम के बारे में दूरदर्शितापूर्ण दृष्टिकोण विकसित न हो सका तो प्रजातंत्र किस काम का ?
प्रजातंत्र में सरकार को बनाने का अधिकार चाहे मतदाता के पास है, परंतु सरकार तो एक तरह से गणपति ही चलाता है । यदि वह व्यक्ति चरित्र, भावना, योग्यता एंव समाज निष्ठा की दृष्टि से हर कसौटी पर खरा उतरता है, तभी वह हमारे वोट का अधिकारी होना चाहिए अन्यथा नहीं । पर उच्च स्तर के नेता आज के समय में हैं कहां ?
कोई समय था जब ऐसे नेता हुआ करते थे जो देश, धर्म एंव संस्कृति के लिए हंसते-हंसते मर मिटने वालें , मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्य न्योछावर करने में अपना गौरव समझते थे और बदले में कुछ नहीं चाहते थे । लेकिन अब ऐसे नेता कहां ? डा॰ राजेन्द्र प्रसाद, पटेल, गांधी, नेहरू, तिलक, अब्दुल कलाम आजाद जैसे निस्पृह, अपने कैरियर पर लात मारकर स्वतंत्रता संग्राम में अपनी क्षमता एवं प्रतिभा की आहुति देने वाले नेता अब कहां ? गरीबों, पिछडों का दुःख-दर्द समझने तथा घर-घर जाकर भूदान-यज्ञ की ज्योति जलाने वाले विनोभा भावे अब चिराग लेकर ढूंढे नहीं मिलेंगे ।
कुप्रथाओं, अंधपरंपराओं, अंधविशवासों के जाल से छुडाने वाले समाज सुधारकों का अब दर्शन दुर्लभ है । पीडितों को उठाने तथा पिछडों को
मार्ग दिखाने वाले विद्दासागर तो मात्र अब स्मृति के विषय बनकर रह गए हैं । कर्मयोग का अलख जगाने तथा ज्ञानयोग की ज्योति
जलाने वाले स्वामी विवेकानंद, दयानंद जैसे मार्गदर्शक अब मुश्किल से मिलेंगे । इसी प्रंसग में एक घटना का जिक्र करना जरूरी है ।
सन १९४९ की बात है । उन दिनों स्वर्गीय
लालबहादुर शास्त्री उत्तरप्रदेश सरकार के गृहमंत्री थे । एक दिन लोकनिर्माण विभाग के कुछ कर्मचारी उनके निवासस्थान पर कूलर लगाने आए । बच्चों को बडी प्रसन्नता हुई कि अबकी बार गर्मी अच्छी तरह से गुजर जाएगी । जब शाम को शास्त्री जी घर आए, तो उन्हें पता चला कि कूलर लगाया जा रहा है, उन्होंने तुरंत विभागीय कर्मचारियों को टेलीफोन् पर मना कर दिया । पत्नी ने कहा-”जो सुविधा बिना मांगे मिल रही है, उसकी मना करने की क्या आवशयकता है ?”
“यह आवशयक नहीं कि मैं मंत्री पद पर सदा बना रहूंगा । फिर इससे बच्चों की आदत बिगड जाएगी । कल लडकियों की शादी करनी है, मान लो विवाहोपरांत इस तरह की सुविधाएं न मिलीं, तो उन्हें कष्ट ही होगा । जाने किस स्थिति में उन्हें रहना पडे ।”शास्त्री जी ने कहा ।
इतनी सादगी और इतनी सराहनीय मिसाल आजके जमाने में मिलनी मुशकिल है । आज के नेतागण जिस शान-शौकत और राजसी ठाठ से रहते हैं, उन्हें देखकर सिर शर्म से झुक जाता है ।
गायत्री परिवार के संस्थापक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगऋषि प॰ श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार-”किसी देश की गरिमा उसकी भौतिक उपलब्धियों से नहीं आंकी नहीं जाती, वास्तविक संपदा तो वहां के चरित्रवान एवं आदर्शवादी नागरिक ही होते हैं । ये ही वास्तव में
देश के बहुमूल्य मणि-माणक्य हैं । सच्ची समृद्धि इसी रत्न की बहुलता पर निर्भर है । किसी राष्ट्र का गौरव उसके लौह नागरिक ही
होते हैं ।”
निःसंदेह उत्कृष्ट व्यक्ति ही अपने देश, समाज एवं युग को धन्य बनाया करते हैं चाहे वो कोई नेता हों या साधारण नागरिक ।
लेकिन दुर्भाग्य से आज देश में ऐसे नेताओं की भीड बढ्ती जा रही है जिनका न कोई उच्चस्तरीय आदर्श है, न सिद्धांत । अपने ही
स्वार्थों, संकीर्णताओं के जाल-जंजाल में बुरी तरह से जकडे हुए भला वे देश और समाज का क्या मार्गदर्शन करेंगे, कैसा नेतृत्व प्रदान करेंगे । हमारे देश का नेतृत्व जो कभी विशुद्ध रूप से कर्त्तव्यनिष्ठ और सेवा का मार्ग माना जाता था जिसे कुछेक निष्ठावा लोग ही स्वेछापूर्वक देश और समाज के प्रति सेवाभाव की भावना से
ओत-प्रोत होकर राजनीति में आते थे । बिना किसी कामना के, बिना किसी महत्वाकंक्षा के । वे कुछ पाते नहीं थे, बल्कि कुछ गंवाते ही थे ।
सादगी जिनका गहणा होती थी, भ्रष्टाचार से कोसों दूर ।
लेकिन आज स्थिति ठीक इसके विपरीत है । आज नेता का नाम लेते ही आम व्यक्ति की नजरों में एक ऐसे भ्रष्ट और खुदगरज व्यक्ति की तस्वीर घूम जाती है, जिसे अपने स्वार्थों के अतिरिक्त और किसी से कोई मतलब नहीं । जो कुर्सी के लिए, अपने पद को कायम रखने के लिए आम लोगों के हितों की बलि भी चढा सकता है । अपने स्वार्थ के लिए वह जहां समस्या नहीं है, वहां पर वह कोई न कोई नई समस्या उत्पन्न कर देगा ।
भोले-भले लोगों को किसी न किसी उलझन में डाले ही रखेगा ताकि वो राजनीति करते रहें ।
आम लोगों को चाहे जरूरत की चीजें उपल्बध हों न हों, इससे उसे कोई सरोकार नहीं है । उसे तो सिर्फ अपने से मतलब है ।
उसे किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए । उसके राजसी ठाठ में कोई कमी नहीं आनी चाहिए । जितना वेतन, सुख-सुविधा और
मुफ्तखोरी में आजके नेता रहते हैं, उन्हें देखकर तो यह लगता ही नहीं कि वे भारत जैसे एक गरीब देश के रहने वाले हैं । दरअसल, अन्य व्यवसायों की तरह आज राजनीति भी एक
व्यवसाय बन गया है । एक ऐसा व्यवसाय जिसमें अपना कुछ लगाना कम पडता है और
कमाई बेशुमार । आज जितने भी नेतागण जो नेतागिरी का धंधा कर रहे हैं, करोडों के मालिक हैं । यदि उनका कुछेक साल पहले का आय का व्योरा देखा जाए तो जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिलेगा । कहां से आया यह सारा धन, कोई इनको पूछने वाला नहीं । यदि कभी किसी के प्रति कोई विभागीय जांच की जाती है, तो मात्र दिखावे की क्योंकि इस हमाम में सभी नंगे हैं । हर कोई एक दुसरे पर अंगुली उठाने वाला है । ऐसे में किस पर दोषोरोपण किया जाए ?
देश तथा समाज का उत्थान नेता पर निर्भर करता है । नेता यदि पथभ्रष्ट हुआ तो देश और समाज भी पतन की ओर अग्रसर होगान ही क्योंकि जैसा राजा, वैसी प्रथा वाली बात यहां कृतार्थ होती है ।
इसलिए अपना मतदान देने से पहले हर प्रकार से अच्छी तरह सोच-विचार कर ही किसी योग्य, ईमानदार और निष्ठावान व्यक्ति को अपना वोट दें ।
आज अधिकतर घरवालों और समाज से तिरस्कृत किए हुए, अपराधी किस्म के लोग राजनीति में ज्यादा प्रवेश कर रहे हैं जिनकी और कोई योग्यता हो न हो सिवाय इसके कि वे पैसे वाले हैं, चापलूसी करना जानते हैं और अवसर का फायदा उठाना जानते हैं । पंरतु हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि तथाकथित नेताओं की इस भीड से देश व समाज का कोई भला होने वाला नहीं है । वे भला देश का क्या नेतृत्व व मार्गदर्शन करेंगें जिनका न कोई उच्चस्तरीय आदर्श है, न सिद्धांत ।
समय की पुकार है कि देश में मात्र ऐसे ही नेता चुने जाएं जो निःस्वार्थ सेवा-परायण, लोभ-लालच से दूर रहकर सचमुच ही देश एवं समाज के लिए कुछ करना चाह्ते हैं । जिनके हृदय में जनता के दुःख-दर्द दूर करने की कसक हो, जो सच्चे अर्थों में जन-जन के हृदय में वास करना चाहते हों । राष्ट्र को आवश्यकता है आज सही अर्थों में परमार्थ-परायण नेताओं की, जो जनता को एक वास्तविक, प्रभावशाली एवं जनोपयोगी नेतृत्व प्रदान कर सकें जिसके पीछे चलने के लिए अगणित व्यक्ति सहर्ष तैयार हो सकें ।
गायत्री परिवार के संस्थापक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ प॰ श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार-
“अनाचार को पदच्युत करने और सदाचार को पदासीन करने के लिए चाहे कोई प्रत्यक्ष शस्त्र साधन भले ही हमारे पास न हो, पर एक साधन अपने पास अभी भी है कि हम भले और बुरे का अंतर करना सीखें । देवताओं की हम प्रत्यक्ष सहायता न कर सकें तो भी उन्हें श्रद्धा, प्रशंसा, सम्मान, सहयोग, समर्थन तो प्रदान
कर ही सकते हैं । असुरों का दमन करना यदि अपने हाथ में न हो तो कम से कम उन्हें निरूत्साहित और लज्जित तो किया ही जा सकता है । सहयोग, समर्थन और सम्मान से उन्हें वंचित किया ही जा सकता है । जनता जब भले, बुरे का, उदार और निष्ठुर का, स्वार्थी और सज्जन का अंतर करने लगेगी और तदनुसार ही उसका मूल्यांकन करेगी, तो उसके अंधेरे के तिरोहित होने में देर न लगेगी, जिसकी आड में निशाचर फल-फूल रहे हैं और देवताओं को निराश्रित होकर ठोकरें खाते हुए भटकना पड रहा है ।”
भविष्य के प्रति आशातीत होते हुए वे कहते है,” भविष्य चरित्रवान नेताओं का है । भ्रष्ट नेताओं का धंधा अब अधिक दिन चलने वाला नहीं है । बेहतर है, समय रहते चेता जाए अन्यथा महाकाल का चक्र उन्हें कहीं का नहीं छोडेगा ।”
अब देश को नेताओं की नहीं, स्त्रजेताओं की आवश्यकता है जो नेतागीरी नहीं बल्कि देश तथा समाज का सही मार्गदर्शन कर सकें । वेदमूर्ति प॰ श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में,”नेतृत्व का उददेश्य लोगों को सही रास्ता बताना है, ह्कूमत करना नहीं ।”
परन्तु यह सब तभी संभव होगा यदि वोटर अपने मतदान का सही इस्तेमाल करके किसी योग्य, उचित तथा ईमानदार व्यक्ति का चुनाव करेंगे ।
अंजना दत्ता