प्रभु की माया
Posted in Uncategorized on 04/06/2009 04:52 pm by Anjana Dattaजो जानता है कि मैं नहीं जानता, पर कहता है कि मैं जानता
हूं, वह झूठा है । जो जानता है कि मैं अंश रूप में जानता हूं
और कहता है कि मैं जानता हूं, वह वास्तव में नहीं जानता है,
कारण कि पूर्णरूपेण जानना वास्तव में असंभव ही है ।
जो जानत है कि मैं नहीं जानता और कहता है कि मैं नहीं
जानता हूं, वह सत्य कहता है । जो जानता है कि मैं अंश रूप में
जानता हुं और कहता है कि मैं नहीं जानता हूं, वह कुछ जानता है,
पर वह अधूरा ही । यह भी प्रभु की माया है ।
जो जानता है कि मैं जानता भी हूं और नहीं भी जानता और्
यही कहता भी है, वह औरों से अधिक जानता है, पंरतु जो जानता
है कि मैं जानता भी हूं और नहीं भी जानता, इसी कारण चुप रहता है,
किसी से कुछ नहीं कहता, वह वास्तव में बहुत जानता है ।
इतना जानकर भी जो प्रभु के प्रेम में सब कुछ भूल जाता है,
वह प्रभु में लय हो जाता है । वह धन्य है ।
वही पूर्णतया जानता है, जो जानकर भी भूल गया है, जो
भक्त है, अनन्य प्रेमी है । वह अब क्या बताए ? उसके पास बताने की कोई बात
ही नहीं है, उसके द्वंद्व मिट चुके हैं । अब कौन बताए और किसे
बताए, बताने को धरा ही क्या है ? यही प्रभु की माया है ।
४९ अखण्ड ज्योति-जनवरी-१९४१, पृष्ठ १४