ऐसे थे हमारे परमपूज्य गुरूदेव
Posted in Uncategorized on 04/06/2009 04:52 pm by Anjana Dattaवैदिक ऋषिगण, अनुभवी महासाधक, सभी एक स्वर से
कहते हैं कि साधना-पथ महदुर्गम है । इसपर निरंतर चलते
रहना व अपने लक्ष्य को पा लेना गुरूकृपा के बिना संभव
नहीं । कठोपनिषद की श्रुति कहती है,”यह साधना-पथ छुरे की
धार की भांति अति दुष्कर है । यह पथ अति दुर्गम है, ऐसा
अनुभवी ऋषियों का कहना है ।”
परंतु गुरूकृपा इस दुर्गम पथ को सुगम बना देती है ।गुरू-करूणा
का संबल पाकर ही शिष्य इस पर चलने में सफल होता है ।
सदगुरू के स्नेह-सिंचन से ही साधक की साधना पूर्ण होती है ।
गुरू से श्रेष्ठ तीनों लोकों में कुछ नहीं है । गुरूमुख में ही
ब्रह्मविद्दा स्थित है । गुरूभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता
है । गुरू ही अज्ञान के अंधकार को हटाने वाले प्रकाश्स्त्रोत हैं ।
गुरूकृपा से ही माया की भ्रातिं नष्ठ होती है । अपने शिष्य का योगक्षेम
को वहन करने में हमेशा गुरू आगे ही रहता है । चाहे वह कितना ही
विपत्तिग्रस्त हो, अभावग्रस्त हो या अज्ञानी स्थिति में हो, यदि गुरू उसका
सखा समान, मित्र समान सदैव मार्गदर्शन करता है तो सारे
रास्ते आसान होते चले जाते हैं । गुरू ही साधक के साधना-पथ
का दीप प्रज्जव्लित करता है । इससे निकलने वाली प्रत्येक
किरण के प्रकाश में साधक का साधनामय जीवन उज्जवल
होता है । गुरूतत्त्व जितना श्रेष्ठ है, उतना ही श्रेष्ठ है गुरू का
कार्य । सदगुरू का कार्य सदगुरू की चेतना का ही विस्तार है ।
परमपूज्य गुरूदेव कहा करते थे,”हम शरीर नहीं, विचार हैं ।
शब्दों में बडी शक्ति होती है । गिरते मनोबल वाले को ऐसा
उछाल देते हैं कि वह असामान्य कर गुजरने की स्थिति में आ जाता है ।
प्रस्तुत है उन्ही के संबध में कुछ रोचक प्रसंग जिनमें उनका
अपने शिष्यों के प्रति स्नेह एवं आत्मीयता स्पष्ट झ्लकती थी ।
07/18/2009 at 12:29 am
परमपूज्य गुरूदेव आपकि जय हो