Archive for May, 2009

इस युग के विशवामित्र – वेदमूर्ति तपोनिष्ठ श्रीराम शर्मा आचार्य

“जिसने मुझे जान लिया, समझो उसने गायत्री को जान लिया ।” यह ऐताहासिक उदबोधन गायत्री परिवार के संस्थापक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परमपूज्य श्रीराम शर्मा आचार्य ने वर्ष १९८६ ई. के वसंत पंचमी पर्व पर किया था । सत्य ही तो कहा था उन्होंने । उनका समूचा जीवन गायत्रीमय ही तो था । जीवनभर गायत्री की अनवरत साधना पूरी निष्ठा और श्रृद्धा से संपन करने के कारण ही वे तपोनिष्ठ बने और वेदमाता गायत्री के वरद पुत्र की तरह अपने कठोर तप और साधना से गायत्री की विलुप्त शक्तियों को फिर से उजागर करने पर वेदमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुए ।
परमपूज्य आचार्य जी ने अपने जीवनकाल में चौबीस-चौबीस लक्ष्य के २४ गायत्री महापुरूषचरण किये । प्राचीनकाल में सवा करोड गायत्री जप करने वाले को वशिष्ठ की पदवी प्रदान की जाती थी ।
पंरतु पूज्य आचार्य जी ने तो अपने जाप में ब्रह्मर्षि विशवामित्र को भी पीछे छोड दिया क्योंकि उनका जाप भी इनसे कम ही था । इस तरह छ करोड के लगभग गायत्री जप किया । अपने इस महान तप के कारण ही उन्हें इस युग का विशवामित्र कहा जाता है । महर्षि वशिष्ठ तो गायत्री साधना को केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित रखना चाहते थे । परंतु गायत्री मंत्र के साथ आदि ऋषि के रूप में विशवामित्र का नाम जुडा हुआ है । वे ही इसके प्रथम द्रष्टा ऋषि हुए हैं । ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के पावन दिन ब्रह्मर्षि विशवामित्र के तप को पूर्णता मिली जब गायत्री माता धरती पर अवतरित हुई । राजस स्वभाव वाले महाराज विशवरथ ब्रह्मर्षि विशवामित्र बने । आदिशक्ति माता गायत्री उनके अंतःकरण में अवतरित होकर युगशक्ति के रूप में भारत की संपूर्ण चेतना में संव्याप्त हो गई । वे प्राणी मात्र में परमात्म-सत्ता को ही देखते थे और समस्त विशव को अपना मित्र, स्नेही और हितैषी मानते थे । उन्होनें गायत्री मंत्र की कठोर साधना करके एक नवीन सृष्टि की रचना कर डाली ।
ठीक इसी तरह परमपूज्य आचार्यजी ने भी अपने कठोर तप के आधार पर गायत्री परिवार जैसे युग-परिवर्तनकारी संगठन को खडा किया और तीन हजार से भी अधिक पुस्तक-पुस्तिकायों द्वारा लिखा गया ज्ञान-भंडार जिसमें चारों वेद, १८ पुराण, १०८ उपनिष्द, योगवासिष्ठ, २- स्मृतियां, छह दर्शन एवं २४ गीताओं सहित अनेक आर्षग्रंथों के जन सुलभ अनुवाद शामिल हैं, जो सत्तर खंडों में प्रकाशित वाडमय के रूप में प्रतिष्ठित हैं, द्वारा एक नई सृष्टि की रचना करने का प्रयास किया है । अपने क्रांतिकारी विचारों द्वारा एक नये समाज का निर्माण करने का संकल्प लिया । लुप्त हो रही भारतीय संस्कृति की पुनः स्थापना करने हेतु उन्होंने एक विशवकोष स्तर का एक ग्रंथ ‘गायत्री महाविज्ञान’ भी प्रकाशित किया जो पूरे समाज को उनकी एक महत्वपूर्ण देन है । विशवभर में गायत्री यज्ञों की एक श्रृंखला का संचालन कर तथा सारे देश में मंत्रलेखन साधना का प्रसार कर चौबीस अक्षरों वाली गायत्री महामंत्र की महान शक्ति का संदेश दिया है ।
ऋषि-परंपरा के बीजारोपण हेतु तथा उनके द्वारा दिये गये ज्ञान को आगे बढाने के लिए उन्होंने शांतिकुंज, हरिद्वार में एक गायत्री सिद्धपीठ की स्थापना की । विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय एवं गायत्री महाशक्ति व यज्ञविद्या पर अनुसंधान हेतु सुविज्ञ चिकित्सकों, वैज्ञानिकों का स्वंय मार्गदर्शन कर एक परिपूर्ण सुसज्जित आधुनिकतम प्रयोगशाला ब्राह्मवर्चस शोध संस्थान का गठन किया जो एक प्रकार से भगीरथ, परशुराम, चरक, व्यास, याज्ञवल्क्य, विशामित्र, वसिष्ठ, पतंजलि सहित सभी ऋषिसत्ताओं के दुर्लभ ज्ञान को समाज में फिर से उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण योगदान है ।
भारत के भविष्य को उज्ज्वल बनाने हेतु, मनुष्य में देवत्व के उदय तथा धरती पर स्वर्ग के अवतरण को संभव बनाने के उददेश्य से उन्होंने गायत्री उपासना करने पर विशेष बल दिया है ।
गायत्री सृष्टि की मूल शक्ति है और गायत्री मंत्र एक सर्वोपरि मंत्र । भारतीय ऋषि-परंपरा का परम उपास्य मंत्र सदैव से गायत्री मंत्र ही रहा है । इससे बडा और कोई मंत्र नहीं है । जो काम संसार के किसी मंत्र से नहीं हो सकता, वह निशचित रूप से गायत्री द्वारा हो सकता है । हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि और साधक इसे जपते रहे हैं ।
गायत्री एक प्रचंड शक्ति है जिसके परिणाम और चमत्कारी सफलता देखते ही बनती है । गायत्री को त्रिपदा यानि वेदमाता, देवमाता एवं विशवमाता भी कहा जाता है । ज्ञान-विज्ञान का मूल स्त्रोत होने के कारण गायत्री को वेदमाता कहा जाता है । वेदों में जो ज्ञान=विज्ञान भरा पडा है, उस सबका सार गायत्री मंत्र के बीज रूप में विद्दमान है । तमाम देवश्क्तियां इसी महाशक्ति की ही धाराएं हैं और इसी से अपना पोषण पाती हैं । इसीलिए गायत्री को देवमाता भी कहा जाता है । सर्वप्रथम ब्राह्माजी ने घोर तप करके गायत्री के तत्वज्ञान को जाना और गायत्री से ही सृष्टि की रचना के लिए आवशयक ज्ञान एवं शक्ति-सामर्थ्य प्राप्त करने में सक्षम हुए । समूचे विशव की उत्पति गायत्री के गर्भ से होने के कारण यह विशवमाता कहलाई ।
गायत्री व्यक्ति की प्राणरक्षक है । यह धरती की कामधेनु है जो व्यक्ति के दुःख-संताप को हरकर उसमें सदबुद्धि एवं सदभाव जगाकर उन्हें सुख-शांति एवं विवेक प्रदान करती है ।
गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । इसके चौबीस अक्षरों में सदज्ञान, सदभाव और सत्कर्म की प्रेरणा सन्निहित है ।
भारतीय जीवन में जो महत्व गंगा नदी का है, वही गायत्री मंत्र का है । आदिकाल से लेकर आज तक सभी ऋषियों ने एक स्वर से गायत्री की महिमा का गुणगान किया है और इसकी शक्ति को स्वीकारा है ।
विश्वामित्र के अनुसार,”गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है । सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं है ।”
भगवान मनु का कथन है,”ब्रह्मजी ने तीनों वेदों का सार तीन चरण वाली गायत्री मंत्र निकाला । गायत्री से बढकर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहीं है । नित्य एक हजार गायत्री जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है, जैसे केंचुली से सांप छूट जाता है । जो द्विज गायत्री का जाप नहीं करता वह निदां का पात्र है ।”
महर्षि व्यास जी कहते हैं,”जिस प्रकार पुष्प का सार शहद, दूध का सार घृत है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है । सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है । जो गायत्री को छोडकर अन्य उपासनायें करता है, वह पकवान छोडकर भिक्षा मांगने वाले के समान मूर्ख है ।”
नारदजी के कथनुसार,”गायत्री भक्ति का ही स्वरूप है । जहां भक्ति रूपी गायत्री है, वहां श्री नारायण का निवास होने में कोई सन्देह नहीं करना चाहिए ।”
महामना मदन्मोहन मालवीय जी ने कहा था,”ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिये हैं, उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री है ।”
कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर कहते हैं,”भारतवर्ष को जगाने वाला जो मन्त्र है, वह है गायत्री मंत्र ।”
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के अनुसार,”मैं लोगों से कहता हूं कि लम्बी साधना करने की उतनी जरूरत नहीं है । इस छोटी सी गायत्री की साधना करके देखो । यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति बडी भारी है ।”
स्वामी विवेकानंद का कथन है,”राजा से वही वस्तु मांगी जानी चाहिए जो उसके गौरव के अनुकूल हो । परमात्मा से मांगने योग्य वस्तु सदबुद्धि है । गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है । इसलिए उसे मंत्रों का मुकटमणि कहा है ।”
शास्त्र और ऋषि-मुनि गायत्री मंत्र की महिमा गाते हुए थकते नहीं । इसकी प्रशंसा तथा महत्त के सम्बन्ध में जितना कहा जाए, उतना ही कम है । प्राचीन-काल में बडे-बडे तपस्वियों ने गायत्री की ही तपशचर्यायें करके अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त की थीं ।
गायत्री मंत्र से आत्मिक कायाक्ल्प हो जाता है । इस महामंत्र की उपासना आरम्भ करते ही साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है । सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने सेननेक अज्ञानजन्य दुःखों का निवारण अपने आप हो जाता है और साधक आत्म-बल को प्राप्त करता है । इसके अतिरिक्त बीमारी, कमजोरी, बेकारी, घाटा, गृह-कलह, मुक्दमा, शत्रुओं का आक्रमण, दाम्पत्य सुख का अभाव, संतान-दुःख, कन्या के विवाह की कठिनाई, परीक्षा में उत्तीर्ण न होने का भय, बुरी आदतों के बंधन आदि ऐसी अनेकों कठिनाइयों से भी छुटकारा मिल जाता है ।गायत्री माता का आंचल श्रद्धापूर्वक पकडने वाला मनुष्य कभी भी निराश नहीं रहता ।
आजकी विषम परिस्थितियों में जबकि चारों आंतकवाद और अनाचार का बोलबाला है, प्रकृति का परिमार्जन करना अति आवशयक हो गया है जो केवल गायत्री मंत्र द्वारा ही संभव है । परमपूज्य गुरूदेव ने सन १९८४ में अपने मार्गदर्शक के निर्देशन पर सूक्ष्मीकरण की साधना वायुमंडल के परिशोधन, वातावरण के परिष्कार, नवयुग के निर्माण, महाविनाश के निरस्तीकस्रण, देवमानवों के उत्पादन-अभिवर्द्धन हेतु संपन की हैं जो उनका सारे विशव के लिए महत्वपूर्ण योगदान है । जन-जन में गायत्री और यज्ञ की चेतना का विस्तार करने के लिए विशव-भर मं आशवमेध यज्ञों और दीप-यज्ञों की श्रृंखला शुरू कर गायत्री महाशक्ति को विशवशक्ति बनाने की आधारशीला रख दी । जिस तरह कभी विशवामित्र ने अनगढं, अनार्यों, दस्युयों को सुगढ, आर्य एवं देवता बनाकर नूतन सृष्टि का सृजन किया था, ठीक उसी प्रकार इस युग में परमपूज्य गुरूदेव ने हरिद्वार में सप्तसरोवर पर, जिस स्थान पर महर्षि विशवामित्र तप करते थे, गायत्री तीर्थ शांतिकुंज की स्थापना कर गायत्री के तत्वद्रष्टा विशवामित्र की पुरातन संस्कार चेतना की पुनरावृत्ति की है ।
सारा जीवन गायत्रीमय बिताकर गायत्री जयंती के ही दिन २ जून, १९९० को उन्होंने अपनी
स्वेच्छा से महासमाधि ले ली और सदा के लिए गायत्री माता में विलीन हो गए । इसके एक दिन पहले रात में किसी कार्यकर्त्ता ने स्वप्न में देखा कि हिमाच्छादित हिमालय के शवेत हिमशिखरों पर सूर्य उदय हो रहा है, तभी हिमालय में उभर कर एकाएक परमपूज्य गुरूदेव प्रसन्न्चित नजर आते हैं । तभी आकाश में चमक रहे सूर्यमंडल में गायत्री माता कमलासन पर बैठी दिव्य मूर्ति झलकती है । एक अपूर्व मुस्कान के साथ मां कोई संकेत करती हैं और परम्पूज्य गुरूदेव सूर्य की किरणों के साथ ऊपर उठते हुए माता गायत्री के पास पहुंच जाते हैं । थोडी देर तक माता के हृदय में अपनी हल्की सी छवि दिखा कर वेदमाता गायत्री तथा गुरूदेव सूर्यमंडल में समा जाते हैं ।
उल्लेखनीय है कि २ जून, २००९ को गायत्री जयंती एवं परमपूज्य गुरूदेव का महाप्रयाण दिवस है ।
अंजना दत्ता,
#३१२/जी.ऐच.१,
मनसा देवी कम्पलेक्स, सेकटर ५,
पंचकुला (हरियाणा)
पिनः १३४ १०९