Archive for March, 2009

कर्म या पाखंड

 कार्य को आरंभ न करने मात्र से व्यक्ति निष्कर्मावस्था का

आनंद प्राप्त नहीं करता ।  शरीर जे द्वारा निष्क्रय हो हए, तो क्या

लाभ, क्योंकि बंधन और मोक्ष कारण तो मन है ।  मन को निष्क्रिय

बनाना है ।  मन की निष्क्रियता है – कर्म और कर्मफल से अनासक्त रहना ।

  आलसी बनकर बैठे मत रहो ।  फल में अपना अधिकार ही नहीं ।

उद्दोग करने पर भी फल  प्राप्त होगा, यह निशिचत नहीं ।  फल

प्राप्त हो भी, तो वह प्रारब्ध से होता है, उद्दोग उसका कारण नहीं,

 ऐसा समझकर उद्दोग करना ही मत छोड दो ।  कर्म करना

तुम्हारा कर्त्तव्य है, अतः तुम्हें कर्म तो करना ही चाहिए, क्योंकि

तुम कर्म को छोड नहीं सकते, कर्म करने के लिए विवश हो ।

     “न कशिचतक्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत ।  कार्यते

       हावशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैगुर्णैः  ॥”

 कोई उत्पन्न हुआ प्राणी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह

सकता । प्रकृति के गुणों से विवश होकर गुणों द्वारा उससे कर्म

कराया ही जाता है । सभी इस प्रकार प्रतिक्षण कर्म करते ही

रहते हैं ।  चाहे हम इंद्रियों को रोककर कर्म करने से विरत भी

रख सकें, पर मन तो मानने से रहा, उसकी उधेडबुन तो चला

ही करेगी   ।  फिर इस प्रकार इंद्रियों से कर्म न करना कोई अच्छा

तो है नहीं ।  जो मूर्खबुद्धि पुरूष कमेंद्रियों को कर्मों से रोककर

मन के द्वारा  विषयों का चिंतन करता है, वह पाखंडी कहा

जाता है ।

४६                          अखंड ज्योति – अगस्त-१९४०, पृष्ठ १६