कर्म या पाखंड
Posted in Uncategorized on 03/31/2009 10:20 pm by Anjana Dattaकार्य को आरंभ न करने मात्र से व्यक्ति निष्कर्मावस्था का
आनंद प्राप्त नहीं करता । शरीर जे द्वारा निष्क्रय हो हए, तो क्या
लाभ, क्योंकि बंधन और मोक्ष कारण तो मन है । मन को निष्क्रिय
बनाना है । मन की निष्क्रियता है – कर्म और कर्मफल से अनासक्त रहना ।
आलसी बनकर बैठे मत रहो । फल में अपना अधिकार ही नहीं ।
उद्दोग करने पर भी फल प्राप्त होगा, यह निशिचत नहीं । फल
प्राप्त हो भी, तो वह प्रारब्ध से होता है, उद्दोग उसका कारण नहीं,
ऐसा समझकर उद्दोग करना ही मत छोड दो । कर्म करना
तुम्हारा कर्त्तव्य है, अतः तुम्हें कर्म तो करना ही चाहिए, क्योंकि
तुम कर्म को छोड नहीं सकते, कर्म करने के लिए विवश हो ।
“न कशिचतक्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत । कार्यते
हावशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैगुर्णैः ॥”
कोई उत्पन्न हुआ प्राणी एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह
सकता । प्रकृति के गुणों से विवश होकर गुणों द्वारा उससे कर्म
कराया ही जाता है । सभी इस प्रकार प्रतिक्षण कर्म करते ही
रहते हैं । चाहे हम इंद्रियों को रोककर कर्म करने से विरत भी
रख सकें, पर मन तो मानने से रहा, उसकी उधेडबुन तो चला
ही करेगी । फिर इस प्रकार इंद्रियों से कर्म न करना कोई अच्छा
तो है नहीं । जो मूर्खबुद्धि पुरूष कमेंद्रियों को कर्मों से रोककर
मन के द्वारा विषयों का चिंतन करता है, वह पाखंडी कहा
जाता है ।
४६ अखंड ज्योति – अगस्त-१९४०, पृष्ठ १६